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MAHABHARAT

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In previous days, I watched the Mahabharat TV serial. Mahabharat is a literally epic Indian story. This not only belongs to any mythology, but it is also awesome literature by the ancient Indians. We didn't find huge great stories or novels like Mahabharat anywhere in Greece or Mesopotamia. Mahabharat includes extraordinary performances by the cast. You cannot find characters like Shree Krishna and Shakuni the most manipulating characters in history; they teach you how you can win everything with just "words." The learning of Krishna is excellent; you can relate his teachings to your own life. We see characters like Bhishm, Karn and Pandavs that are very unique, which means everybody has their own characteristics. Mahabharat as a story is far ahead of its time. Karmayog, Bhaktiyog, and Gyanyog are such ideas that every person needs to know. I have seen Sidhharth Kumar Tiwary's Mahabharat. The majority of people like old B.R Chopra Mahabharat, but in this Starplus Maha...

भूपेश था तो भरोसा था

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  भूपेश बघेल   सर्वप्रथम छत्तीसगढ़ी अस्मिता, गरिमा, महिमा, खान–पान, भाषा, रीति–रिवाज, प्रत्येक पर्व, महापुरुषों को राजकीय स्तर पर प्रचलित करने हेतु साधुवाद।  भारत देश जहां अधिकतर गौभक्त वास करते हों वहाँ एकलौता राज्य जिसमें गोबर भी बिकता था इससे अधिक कुछ कृषि हितैषी होना संभव नहीं, विभिन्न योजनाओं का ही असर था कि 2-3 लॉकडाउन में भी छत्तीसगढ़ ‘ऑटो सेक्टर’ जैसे ऊंचे उद्योग तक में वृद्धि कर रहा था वहीं आर्थिक प्रयासों के अलावा कर्मचारियों का वेतन तक नहीं कटा था जो कि कम से कम मेरी स्मृति में जीवंत है। आपकी उपलब्धियों में आरोप - प्रत्यारोप की राजनीतिक जवाबी के साथ - साथ आपका लगातार केन्द्रीय संस्थाओं व निरंकुश केंद्र के साथ संघर्ष भी रहा यह आपको वास्तव में राजनीतिक योद्धा साबित करता है यह अवसर अन्य राज्यों के भी मुख्यमंत्रियों को भी मिल सकता था पर मोर्चा खोलने का साहस करना आसान नहीं यह वह समय था जब काँग्रेस की पुकार उठना भी बंद हो चुकी थी (लगभग विलुप्त) उसी दौरान लगातार पदयात्रा करके जनमानस में गुहार लगाना यह अपने आप में ही गर्व समझने की बात है, देर सवेर आपकी कमी हर रूप में म...

अजवाइन

                                               अजवाइन वैज्ञानिक नाम — Trachyspermum - ammi L. कुल — Apiaceae उत्पति स्थान — मिस्र अजवाइन देश के विभिन्न हिस्सों में भिन्न–भिन्न नामों से जाना जाता है। अजवाइन का उत्पादन भारत के अलावा विश्व में पर्शिया, ईरान, मिस्र, अफगानिस्तान, पाकिस्तान और उत्तरी अफ्रीका देश भी करते हैं। भारत में अजवाइन की खेती मुख्यतः राजस्थान, गुजरात, आंध्र प्रदेश, मध्यप्रदेश, बिहार, तमिलनाडु, उत्तरप्रदेश, पश्चिम बंगाल राज्यों में की जाती है। जलवायु —   अजवाइन ठंडे मौसम की फ़सल है और इसे मुख्यतः रबी सीजन में लगाया जाता है क्योंकि पौधे के विकास के लिए शीत व शुष्क जलवायु उचित होती है जबकि अधिक आद्रता अजवाइन के पुष्पन को प्रभावित करती है। लगातार नम व आर्द्रता का होना कीट–व्याधि प्रकोप लाता है। अजवाइन हेतु अनुकुलतम तापमान 15-27°C होता है एवं अजवाइन की फ़सल सूखा प्रतिरोधक होती है। मृदा — अजवाइन की खेती सभी प्रकार की भूमि में की जा सकती है परंतु रेतीली ...

शराबबंदी - एक राजनीतिक ढकोसला

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               " शराबबंदी" शब्द सुनकर मन में सरकार के प्रति चुस्ती समाज में जागरूकता व लोगों में कुछ कर दिखाने की छवि नज़र आती है पर आवश्यक नहीं कि जो दिखाई दे वह हो भी क्योंकि यह शब्द मात्र लचर कानून व्यवस्था, अशिक्षा, अजागरुकता व वोट बैंक का सूचक है मैं दावे से कह सकता हूँ कि अगर ऐसा शब्द किसी विकसित देश में आया भी तो लोग हँसकर भारतीयों की मानसिकता का मज़ाक उड़ाने में पीछे नहीं हटेंगे। भारत में हर चुनाव में कोई न कोई राजनीतिक दल इस चुनावी ढकोसले की बात अवश्य करता है हाँ अलग बात है कि कुछ दल चुनाव से पहले शराबबंदी को अपने घोषणा-पत्र में घोषित कर देते हैं तो वहीं छत्तीसगढ़ राज्य के एक क्षेत्रीय दल ने तो स्टाम्प पर लिखकर अखबारों में प्रेषित करा दिया था, मतलब प्रचार तो इतना गंभीर है पर क्या सरकार गंभीर है?                           गुजरात ने तो 70 के दशक में ही शराबबंदी लगा दी यह देखकर बिहार ने सोचा होगा कि वाह गुजरात राज्य तो बिन नशे के बेहतर कार्य कर रहा है और दशकों से बढ़ता ज...

अधिकारियों का सेलिब्रिटीकरण

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                                      हम नेताओं, शिक्षकों, कार्यालय के बाबू, चपरासी आदि के भ्रष्ट, आलसी, लालची होने की आलोचना तो हमेशा करते हैं पर अब उस दृश्य के दर्शन ही नहीं होते जब कोई किसी बड़े अधिकारी या थानेदार की आलोचना का समावेश हो आख़िर इसके पीछे कारण क्या हैं कि बड़े अधिकारी हम आमजन को सदैव ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ व सत्यनिष्ठ दिखाई पड़ते हैं कहीं उस उच्च पद का हमारी संदेही निगाहों से काफ़ी दूर होना कारण है या सभी अधिकारी सच में नेताओं से बेहतर हैं।  अगर वृहद रूप में देखा जाये तो सभी अधिकारी अपनी प्रसिद्धि चाहते हैं और चाहें भी क्यों न आख़िर वाह-वाही, प्रशंसा किसे नहीं भाती और जनता ने भी दशकों से कठिन परिस्थितियों में नेताओं से कोई आशा न रखते हुए अधिकारियों से अधिक उम्मीद करना शुरू कर दिया है उन्हें एक हीरो-हेरोईन, आइकॉन की तरह देखना चाहते हैं लेकिन अभिनेता, खिलाड़ी का फैन होना अलग बात है और किसी नेता या अधिकारी के फैन आप कैसे हो सकते हैं, हो भी सकते हैं पर उससे नुकसान यह है क...

भावनाएँ और तर्क

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                        यह कोई नयी बात नहीं है कि तर्क के ऊपर भावनाएँ या आस्था या किसी श्रद्धा का हावी हो जाना विशेष बात हो बल्कि यह तो मानवों की काफ़ी प्राचीन धरोहर बन चुकी है फ़िर चाहे वह श्री राम की कथा का बाली बनाम अंगद का युद्ध हो या महाभारत कथा में एकलव्य का अंगूठा भेंट करने का साहस दिखाना, भावनाएँ हमेशा तर्क से भारी होती हैं इन अवधारणाओं को बढ़ाने में कुछ पुरानी फिल्में व धारावाहिक भी कसुरवार हैं पति गम्भीर अवस्था में ICU के bed में लेटा हुआ है पत्नी मंदिर जाकर घण्टी बजाती है सच्चे दिल से आराधना कर देवी को पुकारती है (क्योंकि MBBS पास डॉक्टर ने दवा बंद कर दुआ मांगने कहा है) और अचानक पति कोमा से उठ खड़ा होता है वहीं एक फ़िल्म में तो एक माँ की आराधना से उसके भगवान को प्यारे हो चुके बच्चे वापस पुनर्जन्म लेकर अपने माँ के प्यारे हो जाते हैं जबकि यह भी सच है कि यही भावनाएँ ही हमें पृथ्वी पर मानव का दर्जा भी दिलाती हैं।                          ...

आखिर क्या और क्यों है नक्सलवाद?

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                                                         हमारी पीढ़ी के लिए यह 'नक्सलवाद' शब्द भले ही पुराना हो पर भारत के इतिहास में यह शब्द कोई विशेष ऐतिहासिक नहीं है भले ही यह अभी तक हमारे देश के जवानों को नुकसान पहुंचाने में अव्वल रहा हो लेकिन यह विचारधारा कुछ दशकों से ही फली-फुली है, कुछ बदलाव के विचार और विचारों को कट्टर तरीके से लागू करने वालों की चाह जिसने जन्म दिया एक उग्रवादियों के गुट को जो न सरकार की सुनती है न आम जनता की पैरवी करती है.. आइये आज जानते हैं नक्सलवाद या नक्सलियों के बारे में। सन 1918 एक जमींदार परिवार में जन्म हुआ एक साधारण बच्चे का जो अभी तो साधारण था पर आगे चलकर उसकी विचारधारा असाधारण थी नाम था चारु मजूमदार, बचपन से ही जमींदार परिवार में होने से ही पालन-पोषण में अभाव न होना तो स्वाभाविक था पर चारु मजूमदार इन मामलों में अभिमानी नहीं थे बल्कि उम्र के तकाज़े बढ़ने के साथ उनकी भावना गरीब मजदूरों से ज...