अधिकारियों का सेलिब्रिटीकरण

 
                                   हम नेताओं, शिक्षकों, कार्यालय के बाबू, चपरासी आदि के भ्रष्ट, आलसी, लालची होने की आलोचना तो हमेशा करते हैं पर अब उस दृश्य के दर्शन ही नहीं होते जब कोई किसी बड़े अधिकारी या थानेदार की आलोचना का समावेश हो आख़िर इसके पीछे कारण क्या हैं कि बड़े अधिकारी हम आमजन को सदैव ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ व सत्यनिष्ठ दिखाई पड़ते हैं कहीं उस उच्च पद का हमारी संदेही निगाहों से काफ़ी दूर होना कारण है या सभी अधिकारी सच में नेताओं से बेहतर हैं। 

अगर वृहद रूप में देखा जाये तो सभी अधिकारी अपनी प्रसिद्धि चाहते हैं और चाहें भी क्यों न आख़िर वाह-वाही, प्रशंसा किसे नहीं भाती और जनता ने भी दशकों से कठिन परिस्थितियों में नेताओं से कोई आशा न रखते हुए अधिकारियों से अधिक उम्मीद करना शुरू कर दिया है उन्हें एक हीरो-हेरोईन, आइकॉन की तरह देखना चाहते हैं लेकिन अभिनेता, खिलाड़ी का फैन होना अलग बात है और किसी नेता या अधिकारी के फैन आप कैसे हो सकते हैं, हो भी सकते हैं पर उससे नुकसान यह है कि उनके गलत कार्य को भी आप सही ठहराने का तरीका खोज ही निकालेंगे। 

अधिकारियों को हीरो वाली इमेज देने में भारतीय सिनेमा ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी है तमाम कलेक्टर, एसपी-एसीपी, दरोगा वाली फिल्मों ने कमाल तो कर ही दिखाया है, साथ ही अधिकारी बनने तक का संघर्ष तथा उसके बाद की उसकी शक्तियाँ किसी को भी आकर्षित कर सकती हैं जबकि उतने ही संघर्ष से उभरकर चमकते किसान, व्यापारी बल्कि नेता का भी आकर्षण कुछ फ़ीका पड़ जाता है।

आईएएस आदि अधिकारियों की आचार संहिता में एक टर्म होता है जिसे कहते हैं - "एनोनिमिटी" या "अनामिकता" जिसके अंतगर्त अधिकारियों को अपनी पहचान छुपाकर रखनी होती है अर्थात किसी कार्य को किया जाये तो यह पता चलना चाहिए कि कलेक्टर या एसपी साहब ने इस काम को अंजाम दिया पर अब यह चलन काफ़ी मामलों में बदला दिखता है, अधिकारियों ने तो खुद की प्रसिद्धि के लिये तो स्वयं के इंस्टाग्राम एकाउंट बना रखे हैं जिसमें इनके लाखों अनुयायी है तथा ब्लू टिक अर्थात ऑफिसियल एकाउंट का थप्पा भी लगता दिखने लगा है मेरे अनुसार तो यह महान भारतीय लोकतंत्र के सेवक को शोभा नहीं देता क्योंकि देश के सेवक तो सभी आमजन भी हैं और इस सोशल मीडिया की होड़ में न सिर्फ आईएएस, आईपीएस ही नहीं बल्कि तहसीलदार और एसडीएम भी अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराते हैं और छोटे शहरों में तो नवीन थानप्रभारी भी ज़्यादा पीछे नहीं हैं बल्कि सिर्फ़ सोशल मीडिया ही नहीं एक पुलिस अधिकारी ने तो अपने 15-20 साल मात्र की ही आत्मकथा लिख डाली है जिसमें वही सामान्य घटनाएं हैं जो एक सामान्य किशोर करता रहता है उसमें असामान्य है तो सिर्फ़ गालियाँ और अपनी प्रेमिका के साथ के दैहिक सम्बंध बाद में उसके ही प्रति रोष हालांकि भारतीय किशोर समाज में यह भी सामान्य है लेकिन साहित्य व किताब की दृष्टि से सब असामान्य, असंबंधित ही है आप इसे प्रसिद्धि पाने का सरल हल कह सकते हैं। यह उसी प्रकार है जैसे अभी कुछ महीनों पहले समीर वानखेड़े की प्रशंसा की जा रही थी। 

आईपीएस अधिकारियों में अग्रणी नाम दिवंगत एस.एस खेड़ा का है (यह 1947 विभाजन के बाद हुए मेरठ दंगों में टैंक उपयोग करने हेतु प्रसिद्ध हुए थे) जो विन्रम तथा प्रचार से सदैव दूर रहने वाले अधिकारी थे जिनके बारे में गूगल तक में अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं। उनका कहना था कि अगर अधिकारी रहते आपका नाम एक बार अख़बार में आ गया तो आपके ऊपर कलंक लग गया, आपकी फ़ोटो छप गयी तो आपने बर्खास्तगी को न्यौता दे दिया। लेकिन अब अधिकारियों के सेलिब्रिटी बनने का जुनून तो दिखाई ही पड़ता है जबकि वहीं अधिकतर अधिकारी शांति से अपना कार्य गंभीरतापूर्वक और गुमनाम रहकर करते हैं।

सभी अधिकारी व सभी व्यक्ति एक जैसे नहीं होते लेकिन जिन अधिकारियों को आपने बतौर अभिनेता व नेताओं की जगह पर बेहतर विकल्प रख दिया है कभी अधिकारियों के मनमाने रवैये से भी परिचित होना चाहिए पुलिस की क्रूरता के किस्से तो अब हर महीने की आम बात हैं -
1. तमिलनाडु पुलिस द्वारा निर्दोष बुजुर्ग पिता व बेटे की पुलिस लॉकअप में हत्या
2. छत्तीसगढ़ के एक कलेक्टर द्वारा नाबालिग को ज़बरन पीटना व बदसलूकी
3. CAA/NRC आंदोलनकर्ताओं की अवैध गिरफ्तारी अवैध हिंसा
4. किसान आंदोलन के विरोध में आंदोलनकर्ताओं के साथ गंभीर हिंसा
4. छ.ग के रायपुर व बिलापुर में ही थानेदारों द्वारा गरीब आमजन की पिटाई
5. एवं दिल्ली के श्रेष्ठ विश्विद्यालयों में देर रात घुसकर पढ़ रहे छात्रों से मारपीट तो अलग ही स्तर का अपराध बनता है।

यह तो मात्र कुछ प्रसिद्ध उदाहरण ही हैं ऐसे और उदाहरण आप भी जानते ही होंगे क्या आपका संविधान आपको इसकी इजाजत देता है क्या आप एकजुट होकर अपने हाईकमान नेता को उलट जवाब नहीं देना चाहते? यह सवाल इन अधिकारियों से जनता की अदालत में किया जाना चाहिए पर उसके लिये सर्वप्रथम जनता को ही अदालत का रूप धारण करना चाहिए जो कि निष्पक्ष हो या अधिकारियों के फैन न हो।






धन्यवाद।

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