भावनाएँ और तर्क
यह कोई नयी बात नहीं है कि तर्क के ऊपर भावनाएँ या आस्था या किसी श्रद्धा का हावी हो जाना विशेष बात हो बल्कि यह तो मानवों की काफ़ी प्राचीन धरोहर बन चुकी है फ़िर चाहे वह श्री राम की कथा का बाली बनाम अंगद का युद्ध हो या महाभारत कथा में एकलव्य का अंगूठा भेंट करने का साहस दिखाना, भावनाएँ हमेशा तर्क से भारी होती हैं इन अवधारणाओं को बढ़ाने में कुछ पुरानी फिल्में व धारावाहिक भी कसुरवार हैं पति गम्भीर अवस्था में ICU के bed में लेटा हुआ है पत्नी मंदिर जाकर घण्टी बजाती है सच्चे दिल से आराधना कर देवी को पुकारती है (क्योंकि MBBS पास डॉक्टर ने दवा बंद कर दुआ मांगने कहा है) और अचानक पति कोमा से उठ खड़ा होता है वहीं एक फ़िल्म में तो एक माँ की आराधना से उसके भगवान को प्यारे हो चुके बच्चे वापस पुनर्जन्म लेकर अपने माँ के प्यारे हो जाते हैं जबकि यह भी सच है कि यही भावनाएँ ही हमें पृथ्वी पर मानव का दर्जा भी दिलाती हैं।
मुझे लगता है भारत सबसे भावनाशील देश है इस देश के पास जो भावनाओं की विरासत है वह अनोखी है दुर्लभ है, आपको किसी भी मामले में भावनाओं से काम लेने वाले लोग बहुतायत में मिल जायेंगे चाहे वह चयन हो या पसंद हो या किसी भी धर्मावलंबियों की आस्था का मामला हो भले ही वह उस धर्म के सिद्धांतों से भिन्न क्यों न हो परंतु फ़िर भी आस्था का मामला जानकर भाषण या हस्तक्षेप न करना ही आपके लिये बेहतर होगा लेकिन जब यही भावनाएँ व्यक्ति पर हावी होकर चुनाव, हिंसा, राजनीति पर प्रदर्शित होने लगती हैं तब इस बारे में बात करना आवश्यक हो जाता है। "फलां नेता हमारे जाति से है हम सभी को उसको ही मत करना चाहिए" "वह हमारे धर्म का प्रतिनिधित्व करेगा हमें एक मत होना चाहिए" "वह हमारे क्षेत्र का नेता है अवश्य ही नाम ऊँचा करेगा" इन खोखली बातों में ही आपके जाति/क्षेत्र/धर्म के पिछड़ेपन का राज छिपा हुआ है आप जिन उम्मीदों से उन्हें चुनते हैं क्या वह आपकी उम्मीदों पर खरे उतरते हैं? आपके गाँव के किसी नवयुवक की शादी में वह आशीर्वाद रूपी पैसे या अपने हेलीकॉप्टर में बारात भेजकर अथवा किसी पुराने मुखिया के दशगात्र पर उपस्थित होकर या सर मुंडवा कर वह न ही आपके समाज का भला किये बल्कि उल्टा आपको ही उनका एहसानमंद बना देते हैं और आप भारतीय होने की वज़ह से उनके वफादार हो जाते हैं और वह हो जाते हैं अजेय बाहुबली। व्यक्तिगत मदद व्यक्तियों या समाज का फ़र्ज है न कि किसी नेता का, नेता का फ़र्ज तो इतना है कि वह समग्र समाज का उद्धार करे उस समाज को इतना प्रभावी बनाये सक्षम बनाये कि उन्हें बारात में जाने के लिये किसी अन्य के वाहन की आवश्यकता न हो, ख़ैर हेलीकॉप्टर और आशीर्वाद रूपी धन की बातें तो देश स्तर में बहुत छोटी हैं भले ही यह समाज सुधार स्तर में महत्व रखती हों। वैसे समाजसेवा भी तो राजनीति का ही बचा हुआ शेष कार्य ही है।
आपको जनवरी 2021 में घटी कैपिटल बिल्डिंग (अमेरिकी संसद) घटना तो याद ही होगी.. कैसे हजारों अमेरिकी ट्रम्प समर्थकों ने हथियार लेकर वहाँ की सांसद में धावा बोल दिया था।
यह कोई आम बात नहीं थी यह विश्व के सबसे पुराने लोकतंत्र जो कि 232 वर्ष पुराना है उस पर हमला था, अमेरिका कोई हमारा पड़ोसी मुल्क भी नहीं जहाँ इस तरह की घटनाएं या तख्ता पलट के आदतन हों यह अमेरिका के इतिहास का सबसे काला दिन रहा होगा जिससे सबसे बड़ा अपमान अमेरिकी नागरिकों का ही हुआ बाद में यह अपमान लोकतंत्र का था। यह भी एक गौर करने वाली बात है कि हमलावर विशेषतः गोरे व पुरुष थे ऐसा लगता है कि किसी ने उन्हें उकसाया हो किसी व्यक्ति या किसी दबी पुरानी विचारधारा विशेष ने तभी एक ही देश में अन्य लोगों के होते हुये भी गोरे पुरुषों का पहुँचना ही अपने आप में कई सवाल खड़े करता है, मुझे तो यह किसी श्रेष्ठता बोध से प्रताड़ित मानसिक मरीजों जैसा प्रतीत होता है आपको भारत में हर मामलों में सिर्फ़ खुद को, समाज को, धर्म को ही श्रेष्ठ बताने वाले आसानी से मिल जायेंगे संभव है कि आपको अपने ही परिवार में मिल जायें।
वैसे यह घटनाएं कोई एकाएक नहीं घटी थी अगर आप कुछ बिंदु अमेरिका व भारत में मिलाना चाहें तो आसानी से बहुत कुछ मिलता-जुलता पा सकते हैं मिलने-जुलने का अर्थ यह है कि अमेरिकी सांसद पर हमले जैसी घटनाएं भारत में भी होना कोई विशेष प्रकार से चौंकने की बात नहीं बल्कि भारत में यह ज़्यादा आसान है क्योंकि आप तो जानते हैं न भारत तो इतना भावनाशील है जो क्रिकेट मैच हारने पर खिलाड़ियों को कोसने के साथ-साथ अपने ही घर के टेलीविजन को तोड़ने में भी संकोच नहीं करेगा क्योंकि हम 'आदतन बदमाश' तो नहीं पर 'आदतन भावुक' जरूर हैं।
आइये उन अमेरिकी-भारतीय समानता वाले बिंदुओं को भी ज़रा जानने का प्रयास करें जिन्हें जानना आपके इस लेख को पढ़ने के संघर्ष को सार्थक बना देगा -
1. पिछले दशकों में राजनीतिक हिंदूवाद का प्रतिवर्ष बढ़ना, यही समस्या अमेरिका में भी पिछले कुछ दशकों से आयी कि कुछ विशेष रंग वाले समुदाय के नेता ही देश के नेता हो हालांकि इसका कारण फिर वही श्रेष्ठता बोध ही होगा, अतः यह दोनों चीजें एक समान नज़र आती हैं जो कि अपने जैसे नेता को देश का नेता बनाने में तुली हुई हैं।
2. "Strongman Politician" पिछले दशक में ही यह नया शब्द ईज़ाद किया गया क्योंकि कई जगह देखने पर आप पायेंगे कि किसी मज़बूत, शक्तिशाली, चौड़ी छाती वाले बब्बर+सवा शेर जैसे नेता की खोज में लगी जनता मात्र अच्छे भाषण देने वाले किसी नेता को चुनती है जो कि अर्थव्यवस्था की वही हालत कर बैठता है जो हाल लोकतंत्र का रूस जैसे आदि देशों में हैं। अतः अमेरिका और भारत की जनता ने शक्तिशाली नेताओं को पा लिया है और उनकी शक्ति भी देख ही ली है।
3. सरकारी संस्थानों पर निरंतर प्रहार के मामलें में भी भारत ने अमेरिका को आगे नहीं जाने दिया है चाहे वह अदालतें, जाँच एजेंसियां, पुलिस या सबसे महत्वपूर्ण पत्रकारिता हो इन सब पर गहरा कुठाराघात किया गया इस बात से हम विश्व से नजरें नहीं चुरा सकते भारत की सरकार द्वारा सबसे गंभीर हमला पत्रकारिता पर किया गया है जिसके ईलाज हेतु जनता को ही चिकित्सक बनना होगा अन्यथा पत्रकारिता की इस चोट से तकलीफ जनता को ही होगी अभी हाल ही में आपको दैनिक भास्कर में पड़े ई.डी छापे याद ही होंगे न हो तो सिर्फ न्यूज़ एंकर अर्णब गोस्वामी के लिये आधी रात में खुले सुप्रीम कोर्ट की घटना भी ज़हन में तो होगी ही।
4. सोशल मीडिया के इस दौर में आपको जो मोनोपॉली आपको ट्रम्प व मोदी की मिलेंगी वह शायद ही किसी अन्य समय में अन्य नेताओं की मिलेंगीं पूरा सोशल मीडिया इनके ही IT Cell से भरा हुआ है जो दिन छांटकर अफ़वाह चलाते हैं बल्कि इतिहास को बदल देने की क्षमता भी रखते हैं।
5. विपक्ष को हल्के में भी न लेना या अस्वीकार ही कर देना जैसे कि अमेरिका या भारत में विपक्ष की आवश्यकता ही न हो और अपने देश में तो अभी कुछ महीने पहले सामने आया इसरायली मालवेयर 'पेगासस' जो कि विपक्षी नेताओं के फ़ोन की जासूसी कर रहा था यह तो नयी तकनीक है।
6. अमेरिका व भारत के कुछ नारों को ज़रा मिलाकर देखते हैं - "America First" "Make America Great Again" = "सबका साथ-सबका विकास" "अच्छे दिन" "नया भारत" इन नारों से ऐसा लगता है जैसे यह दोनों देश अपनी खोई हुई अस्मिता को वापस लाना चाहते हैं जैसे किसी शताब्दी में कभी स्वर्णकाल रहा हो यह पार्टियाँ उस बीते हुए स्वर्णकाल को दोहराकर रहेंगी जैसे विकास के लिये वही आवश्यक है।
7. समानता वाले बिंदुओं के अलावा कुछ और चीजें हैं जो भारतीय लोकतंत्र के लिये और भी बद्तर हैं जैसे सरकार का RBI, आर्थिक संस्थाओं, चुनाव आयोग व समस्त जाँच एजेंसियों में हद से ज़्यादा हस्तक्षेप। हर चुनाव में ही जब चुनाव आयोग पर तरह-तरह के आरोप लगते हैं तो लोकतंत्र की पवित्रता कैसे बनी रह सकती है? अतः इन सरकारों को देखकर कोई यह कह सकता है कि इनका 'लोकतंत्र एक मुखौटा है' और यह देशभक्ति की परिभाषा स्वयं अनुसार ही बनाकर चलते हैं स्वेच्छानुसार संशोधन कर उसे थोपते हैं।
साथ ही आपको इस वर्ष आयी अमेरिकी संस्था Freedom House की report "Partly Free India" भी ज्ञात होनी चाहिए कि कैसे हमारे पुरखों ने जिस आज़ादी के लिये सब कुछ दांव पर लगाकर न जाने कितनी ही जानों की आहुति का मोल पटाकर देकर हमें आज़ादी मुफ़्त में दी जिसे आज हमने मात्र सात सालों के भीतर ही कितनी आसानी से चले जाने दिया सारा देश सिर्फ़ साम्प्रदायिकता से धू-धू कर जल रहा है और दिन-प्रतिदिन केरोसिन रूपी कट्टरपंथी व नेता इस आग को बढ़ा रहे हैं। अब आपको तालिबान की चिंता करने की आवश्यकता नहीं क्योंकि यह भी मात्र एक बढ़े हुये कट्टरपंथ का ही रूप है पहले आप आसपास का ही माहौल समझें वही आपको चिंता दिलाने के लिये काफ़ी है, अभी इस सप्ताह ही हुये कवर्धा दंगों ने भी छत्तीसगढ़ से 'शांतिप्रिय राज्य' का दर्जा भी छीन लिया है, आख़िर इस दिशा में हमें धकेल कौन रहा है? प्रत्येक व्यक्ति को आवश्यकता है कि वह इस बात को गांठ बांधकर रख ले कि मनुष्य को हर वक़्त भावनाओं मात्र से ही फैसले नहीं लेने चाहिए उसे ज्यादातर तर्कों पर ही आधारित होना चाहिए एवं अपनी भावनाओं को खुद तक ही सीमित रखना ही बेहतर होगा या फ़िर अगर मनुष्य सक्षम हो तो उसे बैलेंस बनाना आना चाहिए - न ही पुराने फिल्मों के हीरो की तरह भावनाशील न विलेन की तरह मात्र तर्कवादी।
धन्यवाद।
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