शराबबंदी - एक राजनीतिक ढकोसला
"शराबबंदी" शब्द सुनकर मन में सरकार के प्रति चुस्ती समाज में जागरूकता व लोगों में कुछ कर दिखाने की छवि नज़र आती है पर आवश्यक नहीं कि जो दिखाई दे वह हो भी क्योंकि यह शब्द मात्र लचर कानून व्यवस्था, अशिक्षा, अजागरुकता व वोट बैंक का सूचक है मैं दावे से कह सकता हूँ कि अगर ऐसा शब्द किसी विकसित देश में आया भी तो लोग हँसकर भारतीयों की मानसिकता का मज़ाक उड़ाने में पीछे नहीं हटेंगे। भारत में हर चुनाव में कोई न कोई राजनीतिक दल इस चुनावी ढकोसले की बात अवश्य करता है हाँ अलग बात है कि कुछ दल चुनाव से पहले शराबबंदी को अपने घोषणा-पत्र में घोषित कर देते हैं तो वहीं छत्तीसगढ़ राज्य के एक क्षेत्रीय दल ने तो स्टाम्प पर लिखकर अखबारों में प्रेषित करा दिया था, मतलब प्रचार तो इतना गंभीर है पर क्या सरकार गंभीर है?
गुजरात ने तो 70 के दशक में ही शराबबंदी लगा दी यह देखकर बिहार ने सोचा होगा कि वाह गुजरात राज्य तो बिन नशे के बेहतर कार्य कर रहा है और दशकों से बढ़ता जा रहा है तो नीतीश सरकार ने बिहार में भी 2016 से शराबबंदी कर दी, इसे काफ़ी ठोस क़दम बताया गया एकदम मजबूत एक ऐसा क़दम जिससे प्रति व्यक्ति आय में अकल्पनीय इज़ाफ़ा होगा अपराध बिल्कुल निचले स्तर पर गिर चुके होंगे और शिक्षा का प्रभाव बढ़ेगा पर वास्तव में 6 सालों में क्या हुआ इनमें से कोई एक बदलाव भी देश को दिखाई दिया..? बल्कि इसके विपरीत मगध विश्वविद्यालय में 6 साल तक बी.ए और सैकङों बच्चों की कुपोषण से मौत हमने अवश्य देखी क्योंकि बिहार सरकार ने ढकोसलों पर अधिक ध्यान दिया उसमें से शराबबंदी अग्रणी है बिन नियोजन, व्यापार, रोजगार दिये ऐसी चीजों की उम्मीद की गई जो कार्यपालिका व विधायिका के सैकङो प्रयासों के बाद प्राप्त होती हैं। शराबबंदी की इसी देखा-देखी में छत्तीसगढ़ राज्य के 2018 चुनाव में भी काँग्रेस तथा जनता काँग्रेस ने भी पिछली भाजपा सरकार को निशाना साधने के लिये शराबबंदी का मुद्दा उठाया जो आज भी मुद्दा है, लेकिन हमें यह जानना बहुत आवश्यक है कि शराबबंदी मुद्दा क्यों हैं नीचे कुछ कारणों की विवेचना करते हैं :-
1. महिला वोट बैंक -
चुनाव जीतने के लिए ध्रुवीकरण सबसे आसान तरीका होता है चुनाव जीतने का इसलिए इस तकनीक का उपयोग दशकों से होता चला आ रहा है अलग-अलग राजनीतिक दल इसे अलग-अलग ध्रुवों की राजनीति के लिये उपयोग करते हैं, समान्यतः कुछ ग्रामीण महिलाएं अपने घर के नशेड़ी व्यक्तियों से हमेशा परेशान पायी जाती हैं कारण वही घरेलू-हिंसा, चोरी, स्वास्थ्य, अपमान, लापरवाही। हालांकि यह बिल्कुल आवश्यक नहीं कि कोई व्यक्ति शराब के नशे में आकर ही इन कारणों को अंजाम दे वह अन्य नशों के आवेग में आकर भी ऐसा कर सकता है जैसे- रूप, रंग, पद, कद, धन या शक्ति।
2. कर्णप्रिय शब्द -
दूसरी बात तो यह कि जैसा मैंने पहले भी बताया 'शराबबंदी' शब्द सुनकर बड़ा सभ्य बड़ा सुंदर सा प्रतीत होता है भले ही इसकी वास्तविकता बिल्कुल हटकर हो पर कम से कम यह प्रथम दर्शन में सुदर्शन ही लगता है सूरत तो पहले नज़र आती है सीरत का पता तो बाद में ही चलता है न, अर्थात इस शब्द के चुनाव समय में स्फुटन स्तुति से ही कुछ पलड़े वोट झोली में आ गिरते हैं और अगर वह दल नहीं भी जीता तो यह आने वाली सरकार के खिलाफ एक दृढ़ मुद्दा भी हो ही जाता है। जी हाँ, एक तीर से दो शिकार.!!! जबकि लचर कानून व्यवस्था और अशिक्षा, जागरूकता की कमी शराबबंदी के ज़्यादा नजदीक लगते हैं। हो सकता है कि हर अपराधी शराब के नशे में मिले पर हर शराबी अपराध में लिप्त मिले यह असंभव है।
3. समाजिक-व्यक्तिगत परिवर्तन -
सरकार शराबबंदी के वादे के साथ यह दावा भी अवश्य करती है शराब के जाने से व्यक्ति अपनी कमाई का खर्च उचित चीजों पर करेंगे, प्रगतिशील होंगे। अगर कोई व्यक्ति शराब का आदि है तो उस व्यक्ति को शराब की लत छुड़ाकर किसी कार्य में गतिशील रखना एक बेहद नेक कार्य होगा पर ऐसा मुझे लगता है कि यह किसी सरकारी योजना से संभव नहीं क्योंकि प्रायः शराबी भारतीय अजागरुक ही होगा वह शराब का विकल्प न होने पर अन्य विकल्पों को तलाशेगा। आप गुजरात व बिहार का उदाहरण सदैव ले सकते हैं सभी जानते हैं कि गुजरात में शराब प्राप्त करना मुश्किल काम नहीं वहीं बिहार में शराबबंदी के काफी नकारात्मक प्रभाव देखने मिले हैं जैसे लोग अन्य नशों के प्रति आकर्षित हुए हैं जो शराब से बढ़कर नुकसानदेह हैं न सिर्फ़ शरीर के लिये वरन समाज के लिये भी।
सरकारी रूप से शराबबंदी से सरकार को भी जमकर नुकसान होता है तथा राज्य की अर्थव्यवस्था में भी बड़ा फ़र्क देखा जा सकता है कर आदि समस्याएं उतपन्न होती है जिससे महँगाई में भी चार चाँद लग जाते हैं वहीं शराब उद्योग में लगे हजारों-लाखों कर्मचारी भी बेरोजगारी के चपेट में आ जाते हैं ध्यान रहे कि बात न सिर्फ़ शराब कारखानों में लगे कर्मचारियों की है बल्कि इसमें वह सभी शामिल हैं जो शराब बिक्री से किसी न किसी रूप में जुड़े हैं चाहे वह शराब दुकान के बाहर चने-मूंगफली आदि का व्यापार कर जीविका चलाते हैं मैं जानता हूँ कि शराब-चकना ही उनका एकमात्र सहारा नहीं पर इस बात से भी परहेज नहीं किया जा सकता कि उनकी कमाई में यह ज़ोरदार असर डालेगा, यह चना-मूंगफली के किसानों को भी प्रभावित कर सकता है। और ऐसे व्यक्ति जो सालों से शराब बिक्री में लगे हुए हैं वह एकाएक शराबबंदी हो जाने से सम्हल नहीं पाते और वह अपना पुराना काम शराबबिक्री ही करते हैं चाहे वह अन्य राज्यों/देशों से लाकर बेचना हो जिससे सरकारों को बड़ा घाटा भी होता है।
शराब न सिर्फ़ रोज़गार-अर्थव्यवस्था-कर की आवश्यकता है भारत की विभिन्न संस्कृतियों का हिस्सा भी है अनेक समाजों में कई रिवाज बिन शराब के पूर्ण नहीं होते, हिन्दू धर्म में तो वरुणि देव को मदिरा के देवता बताया गया है वहीं सबसे पुराने ऋग्वेद में इंद्रदेव द्वारा मदिरा के 3 तालाब पी जाने का भी उल्लेख है। वहीं कोई व्यक्ति अपना अधिकार समझकर भी दावा ठोक सकता है कि अपनी कमाई अपना खर्च अपना भोग मैं स्वयंनुसार करना चाहता हूँ सरकार क्यों आड़े आना चाहती है यह तर्कसंगत भी प्रतीत होता है कि योजनाओं का लाभ तो उन्हें मिलना चाहिए जिन्हें इसकी जरूरत है।
किसी बालक को हिंसा, झूठ, चोरी, क्रोध, लोभ, राग, द्वेष, कलह, दोषारोपण, चुगलखोरी, असंयम, निंदा, छल-कपट आदि अवगुणों से बचने हेतु सुझाव दिये जायें या न दिये जायें पर शराब से दूरी का सुझाव अवश्य दिया जाता है। अतः शराबबंदी एक गम्भीर चर्चा/बहस का विषय है इसे सब अपने हित के लिये भी उपयोग कर सकते हैं, ऐसे कड़े कानून समाज में परिवर्तन नहीं ला सकते इनके लिये समाज को जागरूक करना ही सबसे बड़ी चुनौती होगी।
धन्यवाद
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