अजवाइन
अजवाइन
वैज्ञानिक नाम — Trachyspermum - ammi L.
कुल — Apiaceae
उत्पति स्थान — मिस्र
अजवाइन देश के विभिन्न हिस्सों में भिन्न–भिन्न नामों से जाना जाता है। अजवाइन का उत्पादन भारत के अलावा विश्व में पर्शिया, ईरान, मिस्र, अफगानिस्तान, पाकिस्तान और उत्तरी अफ्रीका देश भी करते हैं। भारत में अजवाइन की खेती मुख्यतः राजस्थान, गुजरात, आंध्र प्रदेश, मध्यप्रदेश, बिहार, तमिलनाडु, उत्तरप्रदेश, पश्चिम बंगाल राज्यों में की जाती है।
जलवायु —
अजवाइन ठंडे मौसम की फ़सल है और इसे मुख्यतः रबी सीजन में लगाया जाता है क्योंकि पौधे के विकास के लिए शीत व शुष्क जलवायु उचित होती है जबकि अधिक आद्रता अजवाइन के पुष्पन को प्रभावित करती है। लगातार नम व आर्द्रता का होना कीट–व्याधि प्रकोप लाता है। अजवाइन हेतु अनुकुलतम तापमान 15-27°C होता है एवं अजवाइन की फ़सल सूखा प्रतिरोधक होती है।
मृदा —
अजवाइन की खेती सभी प्रकार की भूमि में की जा सकती है परंतु रेतीली दोमट मृदा उचित होती है। इसकी खेती हेतु उचित जल निकास की व्यवस्था आवश्यक होती है। देखा जाये तो अजवाइन की फ़सल क्षारीय मृदा को सहनशील कर लेती है परंतु अधिक उत्पादन और सुविकसित पतियों के लिए 6.5-8.5 का pH उत्तम होता है एवम इसकी खेती अम्लीय मृदाओं में नहीं को जाती है।
फसल प्रणाली —
अजवाइन की खेती आसानी से मिश्रित खेती व अंतराशस्यन में ऊंचे पौधे वाली फसलों के साथ हो जाती है।
भूमि की उत्पादन क्षमता को बनाये रखने के लिए इसे निम्न फसल चक्रों के साथ उगाया जा सकता है —
1. खरीफ़ में चने की खेती के बाद रबी में अजवाइन।
2. खरीफ़ में बरबटी के बाद रबी में अजवाइन।
3. खरीफ़ में मूंग की फसल के बाद रबी में अजवाइन।
किस्म —
- अजमेर अजवाइन 2 (AA-1)
- अजमेर अजवाइन 2 (AA-2)
- अजमेर अजवाइन 73
- अजमेर अजवाइन 93
- प्रताप अजवाइन - 1
- Lam Selection 1, Lam Selection 2
- R.A 1-80, R.A 19-80
भूमि की तैयारी —
भूमि की पहली जुताई मिट्टी पलटने हेतु हैरो या कल्टीवेटर से 2-3 हल्की जुताई करनी चाहिए। दीमक वाली भूमियों पर 20-25kg/hq की दर से एंडोसलफान 4% या क्विनलफोस 1.5% पाउडर के रूप में अंतिम जुताई के समय छिड़काव किया जाना चाहिए।
बुवाई का समय —
अजवाइन की बुवाई सितंबर–अक्टूबर महीने में कर दिया जाना चाहिए क्योंकि सामान्यतः इसकी कटाई दिसंबर–जनवरी तक हो जाती है।
बीज दर —
रबी की फ़सल हेतु 2.5-3kg/hq एवम्
खरीफ़ की फसल हेतु 4-5kg/hq.
खाद व उर्वरक —
वैसे तो खाद व उर्वरक का प्रयोग मृदा उत्पादकता परीक्षण के बाद ही करना चाहिए पर सामान्यतः 10 टन FYM या कंपोस्ट का उपयोग करना बिन जुते हुए खेत में करना लाभकारी साबित होता है। अंतिम जुताई के समय N:P:K 40:50:50 का प्रयोग किया जाना चाहिए। उत्पादक भूमियों में किसी उर्वरक का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए।
सिंचाई —
अजवाइन सूखा व वर्षा आधारित दोनों प्रकार की फ़सल है। सिंचित भूमियों में बुवाई के 4-5 दिन के बाद ताकि अंकुरण बेहतर ढंग से हो सके।
खरपतवार नियंत्रण --
अजवाइन फसल की वृद्धि शुरुआती चरणों मे धीमी गति से होता है अतः यह बहुत महत्वपूर्ण है कि खेत को खरपतवार मुक्त रखा जाए। कुल 2-3 निदाई की जाती है जिसमें पहली निदाई बुवाई के 30 दिनों के बाद की जानी चाहिये। तसेनीक उपचारों हेतु हम प्री-ईमर्जन्स उपचार oxadiargyl @0.075 kg/ha की दर से अथवा pendimethalin @1kg/ha स्प्रे रूप में छिड़काव प्रभावशाली साबित हुआ है।
कीट-व्याधि प्रकोप --
1. Aphids:-
अजवाइन की फसल में aphids का प्रकोप बीज के विकास की अवस्था पर होने लगता है, यह रस को पत्तियों से और विकासशील बीज से चूसते रहते हैं जो कि पौधे की बाहरी दिखावट को बेहद प्रभावित करते हैं।
2. Seed Borer:-
अजवाइन की फसल को मुख्य रूप से जो कीट प्रभावित करता है वह है सीड बोरर, अजवाइन की फसल में 20%
तक नुकसान का भागीदार सीड बोरर को पाया गया है।
उपचार--
नीम का तेल (2%), Thiamethoxam (0.025%0), Imidachlorprid (0.005%) का पत्तियों में छिड़काव करने से कीट-व्याधि प्रकोप से बच जा सकता है।
रोग --
- Root Rot (Rhizocatoniasolani Kuhn.)--
यह एक मृदा जनित रोग है। इस रोग क अंतर्गत 35-40 दिन क पौधों में पीलापन लियबसादन पैदा होने लगती है, एवं पौधा सूखने लागत है। यह अजवाइन की एक बड़ी समस्या है।
नियंत्रण--
- थिरम या कैप्टान @3g/kg की दर से बीज उपचार करने से राहत मिलती है।
- नीम केक का 150kg/ha की दर से उपचार करने पर फफूँदजनक रोगों से भी निपटारा पाया जा सकता है।
- Carbendazim (0.1%) का उपचार भी कारगर होता है।
- Powdery Mildew (Erysiphepolylgoni D.C) --
यह रोग सामान्यतः अंतिम के समय में लगता है, इसमें पत्तियों मे सफेद फफूंद का फैलाव हो जाता है।
नियंत्रण --
- Sulphur (25kg/ha) का ध्रूमण पुष्पन क समय कर देने से निदान मिल जाता है।
कटाई एवं उपज --
अजवाइन की फसल 130-180 दिनों में तैयार हो जाती है, सामान्यतः कटाई फरवरी से मई तक चलती है। फसल को हांसिये से काटकर सूर्यप्रकाश में सुख दिया जाता है। सिंचित भूमियों में इसकी उपज 12-15kg/ha एवं वर्षा आधारित स्थलों में 4-6q/ha प्राप्त होती है।
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