आखिर क्या और क्यों है नक्सलवाद?
हमारी पीढ़ी के लिए यह 'नक्सलवाद' शब्द भले ही पुराना हो पर भारत के इतिहास में यह शब्द कोई विशेष ऐतिहासिक नहीं है भले ही यह अभी तक हमारे देश के जवानों को नुकसान पहुंचाने में अव्वल रहा हो लेकिन यह विचारधारा कुछ दशकों से ही फली-फुली है, कुछ बदलाव के विचार और विचारों को कट्टर तरीके से लागू करने वालों की चाह जिसने जन्म दिया एक उग्रवादियों के गुट को जो न सरकार की सुनती है न आम जनता की पैरवी करती है.. आइये आज जानते हैं नक्सलवाद या नक्सलियों के बारे में।
नक्सलबाड़ी सशस्त्र विद्रोह (1967) -
मई में कुछ ऐसा घटा जिसने देश के पिछड़ों, कमज़ोरों, गरीबों में प्राण फूँक दिये बंगाल के दार्जलिंग जिले में एक गाँव था नक्सलबाड़ी वहाँ एक गरीब किसान लड़का जिसका नाम बिगुल था उसे अपने जमींदार ईश्वर तिर्की से किसी जमीनी विवाद को लेकर झड़प हो चुकी थी जमींदार शक्तिशाली था अतः बिगुल ने चारु मजूमदार से संपर्क करना प्रभावी समझा चारु व कानू भी अपने विचारों को बह जाने या दिखा देने के प्रयास में थे ही अतः उन्होंने से निर्णय किया कि अब से शोषक जमींदार का सर कलम किया जायेगा, फिर भी ज़मीदार ईश्वर तिर्की सरकार के करीबी व शक्तिशाली दोनों थे इसलिए उनकी हत्या संभव न हो सकी इसी बीच जमींदार नागेनराय चौधरी का सर कलम किया गया सर कलम करना इतना आसान न था इसलिए इस भीषण अपराध का बीड़ा दिया गया एक 6.5 फ़ीट के आदिवासी युवक जंगल संथाल को यह कानू के बाद दूसरा मुख्य नक्सली था।
अब सरकार की सेना; पुलिस से मुड़भेड़ हेतु गाँव भर में हथियार बाँटे गये जनता ने जमकर सशस्त्र विद्रोह खोला इससे बंगाल के अन्य जमींदार भी भयभीत होने लगे, गांव के 11 लोग भी मारे गये, नक्सलबाड़ी सेना की मुख्य कमांडर थी शांति नक्सलियों में आज भी लैंगिक समानता बनाकर रखी गयी है।
लेकिन चारु इतनी आसानी से संतुष्ट होने वाला नही थे वह इन सबसे तेजी से प्रभाव चाहते थे इसलिए 1969 में उसने नयी पार्टी का निर्माण किया Communist Party Of India (Marxist & Leninist) - CPI (ML) यह पार्टी तो प्रतिबंधित कर दी गयी पर इनके विचार कमज़ोर जनों में फैलने लगे थे इनमें अपनी हारती आस का नक्सल आज भी सहारा बने हुए है और मात्र कमजोर या अशिक्षित ही नहीं इनके विचारों से उस्मानिया, वारंगल इंजिनीरिंग यूनिवर्सिटीज जैसे उच्चतम संस्थानों से शिक्षित छात्र व अध्यापक भी इनमें हिस्सा लेने लगे थे। समय आ गया था 1972 बंगाल में खलबली का दौर बंगलादेश युद्ध.. केंद्र सरकार ने सोचा यह अच्छा मौका है सेना भी बंगाल में ही है लगे हाथ नक्सलियों को भी निपटाते चले तो कर लिया गया गिरफ्तार चारु, कानू और जंगल तथा अन्य अपराधियों को।
पुलिस की गिरफ्त में ही चारु मजूमदार ने दम तोड़ दिया कहा जाता है चारु को जिस पुलिस थाने में रखा गया था उससे उनकी आवाज थाने के बाहर तक आती थी अतः इसी प्रताड़ना से उन्होंने दम तोड़ दिया। कानू सन्याल जेल में बंद रहते-रहते उन्होंने अत्यंत विचार मंथन किया और पाया कि यह कृत ठीक नहीं था उनका हृदय परिवर्तन हुआ और 1977 में उन्होंने वामपंथी संगठन त्याग दिये, जंगल संथाल भी अपने अंतिम दिनों में शराब के आदि हो चुके थे जिससे उनकी भी मृत्यु सन 1981 में हो गयी।
किसी भी आंदोलन, संगठन की एक विचारधारा होती है जिसकी पटरी पर आंदोलन,संगठन की गाड़ी दौड़ती है बिन विचारधारा के किसी भी स्तर पर जनसमूहों को खड़ा करना व स्वयं भी खड़ा रह पाना अत्यंत जटिल है या असंभव है। चारु, कानू तो ऐसे नेता थे जिनकी कोई विचारधारा थी गरीबों के प्रति गहरी भावना से कार्य करते उनके लिये लड़ाइयां लड़ते थे, चारु, कानू व जंगल तो उपस्थित नहीं थे लेकिन वह लोग तो उपस्थित थे जिन्होंने विद्रोह में हिस्सा लिया था वह विचारधारा तो फैल ही चुकी थी जिसमें अपने हक़ के लिये लड़ने की असीम शक्ति थी। चारु के न रहने के बाद नेतृत्व के अभाव में नक्सल आंदोलन गलत दिशा में जाने लगा यह अराजक होने के साथ जनता के विरोध में भी जाने लगा तभी यह आज सभी समाज से बहिष्कृत हो चुका है एक समय था जब गरीब मजदूरों की रक्षा के लिये कलकत्ता महानगर के अमीर व्यक्तियों तक ने अप्रत्यक्ष सहायता की थी इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह ही है कि स्वयं चारु मजूमदार भी तो जमींदार परिवार से थे। मगर नक्सल आंदोलन के ग़लत दिशा में जाने के साथ ही सभी ने इसका साथ छोड़ देना सही समझा परंतु कुछ लोग आज भी इसे सेना मानते हैं और भाग भी लेते हैं इसके पीछे का कारण भी आपको अवश्य जानना चाहिए।
क्रांति का प्रसार -
चारु जा चुके थे, चारु के जाने के बाद तो यह आंदोलन आज किस प्रकार गलत दिशा में बहक चुका है इससे आप सभी तो परिचित ही हैं, बंगाल से आंध्रप्रदेश के रास्ते में पड़ता है छत्तीसगढ़, बंगाल से आंध्रप्रदेश के जंगल के रास्तों से नक्सलियों का आवागमन बना ही हुआ था इसी बीच चपेट में आया छत्तीसगढ़।
70 के दशक के मध्य अर्थात 1975-76 में सफ़र के दौरान पाया कि बस्तर भौगोलिक दृष्टि से नक्सलियों के लिये अत्यंत महत्वपूर्ण कड़ी साबित हो सकता है चूंकि आज़ादी के पहले और आज़ादी के बाद भी सरकार भी इन जंगली इलाकों में कोई विशेष रुचि नहीं लेती थी रुचि न होने का अंदाज़ा भी इस बात से ही लगाया जा सकता है कि अबूझमाड़ इलाके में कभी कोई सरकार सर्वे न हुआ आज़ादी के पहले अंग्रेजों से कोशिश की तो इलाके के आदिवासियों ने ज़हरीले तीरों से रास्ता रोका वहीं आज़ादी के बाद सरकारें रायपुर तक ही सीमित थीं। नक्सलियों ने भौगोलिक स्थितियों व क्षेत्र में व्याप्त अशिक्षा, गरीबी का नाजायज़ फ़ायदा उठाकर अपने तथाकथित क्रांति के बीज अबूझमाड़ में बो दिये, अबूझमाड़ अर्थात 'जिसे बुझा न जा सका हो' इन अबूझ इलाकों में बाहर के जवानों, पुलिस आदि रणनीति कमजोर पड़ेगी इसी लंबे नियोजन के साथ नक्सलियों ने बस्तर में अपने विचारों को काबिज़ कर दिया तथा बस्तर के घनघोर जंगल से अन्य राज्यों की सीमा में आवागमन भी सुगम हो गया था। लेकिन इस समय तक भी नक्सल किसी विशेष आंतरिक विरोधियों या शत्रुओं में नहीं गिने जाते थे हालांकि नक्सलियों ने पंजाब के खालिस्तानी आतंकियों का समर्थन किया था परंतु फिर भी इनकी मुख्यतः ताकत बढ़ी जब आंध्रप्रदेश के People's War Group और Party Unity और बिहार के Maoist Communist Centre सन 2000 में मिलकर एक ही संगठन बना लिया तभी यह एक मजबूत शत्रु बनकर उभर सके।
नये सदी में इनकी पहचान तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सन 2006 में "देश के सबसे बड़े खतरे" के रूप में कराया हालांकि छत्तीसगढ़ सरकार की तरफ़ से 2005 में सलवा जुडूम अभियान (शांति जुलूस) चलाया था इसमें आदिवासियों को ही हथियार देकर नक्सलियों से निपटने के लिये सक्षम बनाया गया अलग टेंट दिये गये एवं जो आदिवासी अपने गाँव घरों को छोड़कर नहीं आना चाहता था उन्हें भी नक्सली घोषित कर दिया जाता रहा वैसे सभी योजनाओं में कुछ गड़बड़ी होती है परंतु जिसमें निर्दोष जनता के अधिकारों का जान-माल का हनन हो वह भारत के हितैषी योजना तो बेशक नहीं हो सकती इसी बात को ध्यान रखते हुए सन 2011 में सर्वोच्च न्यायालय ने सलवा जुडूम अभियान रदद् किया। सलवा जुडूम तो रदद् किया गया पर नक्सली अभी ताक में थे इस अभियान में शामिल होने वाले लोगों को तथा प्रमुख कांग्रेसी नेता महेंद्र कर्मा (बस्तर टाइगर) आदि को निशाना बनाया गया जिसमें झीरम घाटी जैसी वीभत्स घटनाएं निकल कर आयीं जिसने छत्तीसगढ़ में विपक्ष को लगभग साफ कर दिया था इसकी सरकारी जाँच अब कांग्रेस की सरकार आ जाने के बाद भी आजतक नहीं हो सकी है।
यह है मांडवी हिड़मा इसके अन्य नामों में इदमूल और संतोष अन्य नाम भी शामिल हैं छत्तीसगढ़ में सभी बड़े नक्सली काम इसके ही मार्गदर्शन (एंबुश) में किये गए हैं यह Peoples Liberation Gorilla Army के बटालियन नम्बर-1 का कमांडर है और साथ ही यह 10वीं कक्षा पास भी है वैसे तो यह दक्षिण सुकमा के पुआर्ति गाँव का निवासी है इसकी उम्र 41साल है यह सन 1996 से नक्सली है मतलब यह अपनी 16 वर्ष की आयु से ही माओवादी बन चुका था, पूर्व नक्सली तो इसके बारे में यह भी बताते हैं कि यह किशोरावस्था से ही सभी प्रशिक्षणो में अपने बैच में सबसे आगे था इसकी यह ही एकमात्र पुरानी फ़ोटो है यह काफ़ी सुरक्षा में रहता है इसका भोजन भी अलग से इसके ही भरोसेमंद अंगरक्षकों द्वारा ही बनाया जाता है इसके अलावा पुलिस के पास इससे संबंधित कोई जानकारी नहीं है जबकि इसके सर पर 40 लाख का इनाम घोषित है। नक्सलवाद में आ.प्र लॉबी हावी मानी जाती है पर हिड़मा छत्तीसगढ़ से अभी तक का एकमात्र नक्सली है जो CPI Party (Maoist) के केंद्रीय समिति का हिस्सा है साथ ही CPI Party (Maoist) 22 सदस्यी समिति का भी एक सदस्य है इन बातों से यह ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि हिड़मा कितना दुर्दांत नक्सली है, अगर यह छत्तीसगढ़ का नाम नक्सल के अलावा किसी अन्य क्षेत्र में करता तो छत्तीसगढ़ के लिये यह अत्यंत गर्व की बात होती।
नक्सलवाद के कारण -
1. गरीबी - नक्सलवाद फ़ैलने व बढ़ने का सबसे प्रमुख कारण गरीबी ही है सदियों से चले आ रहे शोषण, लाचारी से जनता त्रस्त होकर अमीरों को अपना दुश्मन समझ कर उनके खिलाफ़त में जंग छेड़ना उन्हें नई उम्मीद व पुराने प्रतिशोध से भरता है।
2. अशिक्षा - नक्सली ऐसे पिछड़े क्षेत्रों में ही काबिज़ होते हैं जहां सरकार की कोई खास रुचि न हो न जहां शिक्षा का कोई अधिक महत्व न हो, अशिक्षित व्यक्ति की राय साफ होती है वह ज़्यादा सोचता नहीं और मार्ग दिखाने पर दौड़ना आरम्भ कर देता है फिर न उसे कंकड़ की परवाह न ही खाई की।
3. असंतोष - बस्तर में कई ऐसे इलाके हैं जो इतने दुर्गम हैं कि वहां न पानी की व्यवस्था न बिजली की बस्तर के दुर्गम इलाकों को देखकर आपको भी ऐसा प्रतीत हो सकता है कि वास्तव में भारत में एक ही समय में कई सदियाँ निवास करती हैं, शिकायत पर कोई सुनने वाला नहीं है आये दिन पुलिस के अत्याचारों की कहानियाँ निवासियों के मुंह-जुबानी हैं।
ऐसी स्थितियों में सरकार से असंतोष उपजना स्वाभाविक है।
4. ज़ोर-जबरदस्ती-फुसलाना - सभी नक्सली स्वयं अपनी इच्छा, मर्जी या विचारों से ही नक्सली नहीं बनते कुछ नक्सलियों या उनके परिवारजनों ने तो ऐसी कहानियां बताई जिसमें बच्चों को जबरन या फुसलाकर ही कभी पढ़ाई या किसी विशेष कला के नाम पर ले गये फ़िर माओवादियों में अपने साथ भर्ती कर प्रशिक्षण देकर एक माओवादी बनाया।
हालांकि सरकार नक्सलवाद से निपटने का निरंतर प्रयास कर ही रही है कभी बल के द्वारा कभी धन के द्वारा कभी विशेष आरक्षण द्वारा, पर शांतिवार्ता ही इन मुद्दों का मुख्य हल है हिंसा तो किसी छोटी से घटना का भी हल नहीं हो सकता इसलिए सरकार उदारता का दिखावा कर अपनी पूरी सैन्य शक्तियों से नक्सलियों का मुकाबला नहीं करना चाहती क्योंकि अपने ही देश के निवासियों पर देश की ही सेना का इस्तेमाल करना सीरिया जैसे हालात भी बना सकता है अब नक्सलियों को भी चाहिए कि कम से कम ग्रामीणजनों के लिये आवश्यक जैसे अस्पताल, विद्यालय, सड़क आदि निर्माण में क्षति न पहुंचाई जाये लेकिन अगर उनके उग्रवादी परिपेक्ष्य में देखें तो नक्सलवाद के कारण का मिटना भी नक्सलवाद का खात्मा होगा।
"साम्यवाद" "वर्गहीन समाज" "वामपंथ" नक्सलों का ढोंग -
कम्युनिस्ट पार्टी का उदय ही सबको बराबर अधिकार देने हेतु हुआ था नक्सलों के जनक चारु मजूमदार भी स्वयं एक वर्गहीन समाज की स्थापना करना चाहते थे इसलिए उन्होंने यह बीणा उठाया हुआ था पर आज के उग्रवादी नक्सली न साम्यवाद न ही वर्गहीन समाज की कल्पना करते बल्कि उन्हें सिर्फ़ आतंकवाद के घटक अधिक आकर्षक दिखाई पड़ते हैं, आप समर्पित नक्सलियों के interview देखें तो यह साफ़ हो जाता है कि बड़े स्तर के नक्सलियों के पास अधिक सुविधाएँ होती है जैसे चाय की सुविधा बड़े स्तर के नक्सलियों को होती है रक्षक, लड़ाके या गनमैन इस सुविधा से दूर ही पाये जाते हैं वहीं बड़े कमांडर आदि बड़े नक्सली ब्रांडेड सामानों के उपयोग करते मिलेंगें तो वहीं छोटे स्तर के नक्सली कामचलाऊ समान, यह चीज़ काफ़ी छोटी है परंतु इन व्याप्त असमानताओं से यह तो कयास लगाई ही जा सकती है कि इन माओवादियों को किसी समाजिक-राजनीतिक पद्धति में न तो भरोसा है न ही तजुर्बा, सिर्फ़ हिंसा के सुचालक व विकास के कुचालक के रूप में देखना अधिक उचित लगता है।
क्या है अर्बन नक्सल?
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) ने सन 2004 में एक "Urban Perspective" नाम से एक दस्तावेज जारी किया जिसमें बताया गया कि CPI (Maoist) के जो पुराने सिद्धांत थे जिनमें ग्रामों को प्रधानता दी गयी थी उसमें अब बदलाव करके शहरी विश्वविद्यालयों के व्याख्याता व लेखक या ऐसे बड़े प्रभावी व्यक्तियों को अपने विचारों से जोड़ना है जिससे CPI (Maoist) के विचारों की ज्वाला शहरियों तक पहुँचे।
धन्यवाद।
सन्दर्भ -
And many others interviews & articles.


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