विशाल जनसंख्या

आप बाल्यकाल से ही जनसंख्या को आरोपी समझते रहे होंगे जहाँ भी जनसंख्या की बड़ी मात्रा पायी जाती है वहाँ अव्यवस्था भी प्रतीत होने लगती है चाहे वह परिवार हो या कोई रेल्वे स्टेशन या बैंक अथवा सरकारी दफ़्तर। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि क्या भारी भीड़ वाली जगहों में व्यवस्था हेतु सुधार कर सकते हैं !! क्या यह संभव है? कभी असंभव लगे तो आप कभी मुस्लिम तीर्थ हज की डॉक्यूमेंट्री देखिये कि कैसे अरब सरकार सब व्यवस्थित करती है तब शायद आपको जानकर हैरानी होगी कि अव्यवस्था का संबंध भीड़ से कम पर असुविधाओं से ज़्यादा होता है। आइये आज जानने की कोशिश करते हैं कि जनसंख्या के सगे-संबंधी या प्रोत्साहित करने वाले कौन हैं ।

                             
                                         भारत में कई नेताओं, परिजन, पानठेला, नाई की दुकान, चाय सेंटरों आदि जगहों में उपस्थित सर्व विशेषज्ञों ने जनसंख्या को लगाम लगाने की राय देते आ रहे हैं जो कि सही भी है क्योंकि ज़ाहिर सी बात है कि कम लोगों के प्रबंधन में कम सुविधाओं में कम खर्च या सेवा होगी लेकिन वहीं कई दक्षिणपंथी नेताओं ने यह भी बताया कि मुस्लिम आबादी तेज़ी से बढ़ रही है और एक दिन यह आबादी हिंदू आबादी को कुचलकर भारत को एक इस्लामिक राष्ट्र बनाने पर आमदा है ईच्छुक है यह परिकल्पना आज़ादी के समय फैलायी गयी थी, तो क्या यह सच में अब संभव है ? 
अगर मुस्लिम आबादी हिंदू आबादी के बराबर होती है तो (अगर की जनसंख्या प्रतिस्थापन दर 2.1% की तर्ज पर चले तो) देश की कुल आबादी 13,000 करोड़ होगी और इसके लिये 6,500 करोड़ हिंदू = 6,500 करोड़ मुस्लिम चाहिए होंगे, क्या यह संख्या एक साथ देश में रह सकती है यह अपने आप में ही एक गूढ़ सवाल है अभी सवा सौ करोड़ में ही आप जनसंख्या को आरोपित करते हैं तब 13,000 करोड़ जनसंख्या की भयानक कल्पना करना ही छोड़ दीजिये, 1981-1991 के बीच मुस्लिम आबादी दर 32.9% थी जो कि 1991-2001 के दौरान 29.3% एवं पिछले दशक 2001-2011 में 24.6% पर आ अटकी यह घटाव महसूस किया आपने ? शायद अचंभा हो पर हिंदुओं की यह जनसंख्या दर मुस्लिमों की अपेक्षा धीमी गति से नीचे आयी है अर्थात हिंदू आबादी उतनी ही बढ़ जाती है जितने इस देश में कुल मुसलमान हैं वो भी मात्र एक साल में । लेकिन हम हमेशा विपरीत सोचने लगते हैं।

वैसे जब भी जनसंख्या नियंत्रण की बात आती है तब चीन सबसे अहम भूमिका अदा करता नजर आता है भले ही इस कानून के दुष्परिणाम सामने आये हों चीन ने 1979 में इस कानून को लागू किया था जो कि 2016 में अप्रभावी हुआ जिसके अनुसार दम्पतियों को सरकारी रूप से एक शिशु करने की ही अनुमति थी विशेषज्ञों द्वारा तो यह भी माना जाता है कि 2005 तक भी इसके नकारात्मक पहलू सामने आने लगे थे, विश्व भर में चीन का सबसे ख़राब लिंगानुपात आंकङों में प्रदर्शित होने लगा अब अगर एक ही बच्चा चाहिए तो अधिकतर जन्मदाता यही सोचेंगे कि बच्चा लड़का ही हो लड़की न हो इसलिए यह खराब लिंगानुपात सामने आने लगा ।

चीन में 4-2-1 आर्थिक समस्या आने लगी जिसमें देश में पेंशन प्राप्तकर्ताओं की संख्या अधिक और काम करने वालों की संख्या कम होने लगी घरेलू पारिवारिक रूप में यह और भी जटिल था क्योंकि माँ-बाप-सास-ससुर को मिलाकर एक ही संतान को बोझ अधिक होने लगा ।

इसी समस्या से बचने के लिये जपान, यूरोप ने आप्रवासन को बढ़ाया ताकि अन्य देशों से लोग आकर इन देशों में बसे व कार्य करें लेकिन ध्यान रखें यह जनसंख्या नियंत्रण आर्थिक रूप से ही नकारात्मक था लेकिन यह पर्यावरण व संसाधनों के रूप में अवश्य फायदेमंद था । भारत में भी 12 राज्यों में ऐसे कानून बना कर खत्म भी किये जा चुके हैं ।
जनसंख्या नियंत्रण के लिये भारत में भी कुछ क्रूर कदम उठाये गये थे इंदिरा गाँधी के समय का नसबंदी आंदोलन जिसमें ज़बरन, बहला-फुसलाकर 1 करोड़ से अधिक लोगों की नसबंदी करा दी गयी थी जिसमें 1,800 जानें भी गयी थी ।
प्रतिस्थापन दर (2.1%) यह वह दर होती है जिसे यह माना जाता है कि अगर यह दर स्थापित रही तो जनसंख्या न घटेगी न बढ़ेगी अर्थात जितने लोग वार्षिक रूप से मरते हैं उतने ही जन्म भी लेते हैं।
बढ़ती जनसंख्या का सीधा जुड़ाव शिक्षा, हेल्थकेयर, साक्षरता दर व प्रति व्यक्ति आय से होता है यह सामान्य है कि बिहार राज्य की आबादी अभी भी तेज़ी से बढ़ रही है 3.23% के साथ व साथ ही साथ यह सबसे युवा राज्य भी है जिसकी औसत आयु मात्र 19.9 वर्ष है आने वाले समय में देश की कुल आबादी का 33% उत्तरप्रदेश व बिहार से ही होगा क्योंकि दक्षिण व कश्मीर राज्यों के साथ कुल 13 राज्यों की जनसंख्या दर घट रही है वहीं भारत में सघनता दर 382 व्यक्ति प्रति वर्ग कि.मी है तो वहीं बिहार की सघनता दर लाखों पलायन के बाद 1106 व्यक्ति प्रति वर्ग कि.मी है । आबादी का सीधा जुड़ाव शिक्षा, जागरूकता जैसे तत्वों से है यह बात आमजन जाने या न जाने पर देश के नेता भलीभांति इस तथ्य से परिचित हैं पर इसके सुधार न करने की इच्छा को लेकर बल्कि वह किसी धर्म, समुदाय विशेष पर आरोप मढ़ना ज़्यादा आसान समझते हैं इसलिए 'मुसलमान अपनी आबादी को बढ़ा रहे हैं' जैसी बातें निकल कर आने लगती है जबकि अगर वहीं हम नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आकंड़े देखें तो लक्षदीप और कश्मीर जहाँ 96% और 68% आबादी मुस्लिमों की है वहाँ प्रतिस्थापन दर 1.4 है असम में यह दर 1.7 एवं बंगाल व केरल में यही दर 1.6 व 1.8 है इनमें उत्तरप्रदेश ही एक अपवाद राज्य है जहाँ दर अधिक है लेकिन उ.प्र के शहरी इलाकों को छोड़ दे तो ग्रामीण अंचलों से ही उ.प्र की जनसंख्या बढ़ती नजर आती है। हालांकि यह भी सच है कि इस्लाम के अनुयायी संख्याबल पर विश्वास रखते हैं इसलिए इतिहास में अपने मज़हब को बढ़ाने या फैलाने (धर्मप्रचार) की कोशिश में कुछ स्थानों पर जनसंख्या का संबंध समुदाय विशेष से हो सकता है इस बात को हम नकार भी नहीं सकते ।
विशेषज्ञों के अनुसार जनसंख्या का चरम भारत में सन 2048 तक आ जायेगा वहीं विश्व को इसके लिये सन 2064 का इंतजार करना पड़ेगा वैसे जनसंख्या में समूचे विश्व ने तरक्की की है तभी मात्र 125 सालों में हमने 160 करोड़ को 790 करोड़ के आंकड़े पर पहुँचाया है । उपरोक्त आकंड़ों का सार यही समझ आता है कि फिलहाल विश्व भर में जनसंख्या नियंत्रण की आवश्यकता तो नहीं बल्कि शिक्षा, जागरूकता, हेल्थकेयर से जुड़े पहलुओं में सुधार की आवश्यकता है और विभिन्न सरकारों को इस सुधार में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए ।






धन्यवाद






संदर्भ -
दैनिक भास्कर अखबार (समस्त राष्ट्रीय आँकड़े)

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