मानवीय संयम बनाम सोशल प्लेटफॉर्म्स
सृष्टि के सभी जीवों में एक समानता है - संयम या धीरज । फिर चाहे वह एक शिकारी जानवर हो या अपने ऑनलाइन आर्डर किये हुए फ़ोन का इंतज़ार करता युवा । संयम या धीरज के बारे में कोई निबंध लिखने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि प्रत्येक मानव को ज्ञात है कि इन तत्व के बिना मानव मन कितना अशांत, विचलित हो सकता है सयंम रहित मन रूठा हुआ, बिगड़ा हुआ या परेशान दिखाई पड़ सकता है साथ ही साथ धीरज के अभाव में व्यक्ति कई बार निर्णय गलत ले सकता है जिसकी भरपाई उसे अवश्य करनी पड़ती है मानव जीवन स्वयं के निर्णयों से ही मोड़ लेता है और तेज़ी से दौड़ता है, तो आइए आज एक क़ातिल के बारे में जानते हैं जिसने हमारी पीढ़ी व आने वाली पीढ़ियों के संयम व धीरज की चरणबद्ध तरीके से हत्या की व निरन्तर करता जा रहा है पर इस ख़ुफ़िया हत्यारे पर शायद ही किसी की नज़र होगी ।
एक जमाना था जब व्यक्ति घंटो बैठकर मोटी साहित्यिक, धार्मिक, समाजिक किताबें पढ़ता था भाषण सुनता था फ़िर सिनेमा आया पूरी कहानी 3 घण्टों के अंदर बतानी चाही और दृश्य-श्रव्य माध्यम का होने की वज़ह से दर्शकों द्वारा काफ़ी पसंद किया जाने लगा, 4 दशक पहले टीवी ने प्रत्येक दहलीज़ में दस्तक दी अब कहानी सुनना देखना और आसान हो गया क्योंकि अब सिनेमा तक जाने की जरूरत नहीं थी सालों तक सिर्फ़ एक ही टीवी चैनल चला - दूरदर्शन (DD National) फ़िर रंगीन टीवी के दौर के साथ ढेरों निजी टीवी चैनल आने लगे बाबरी मस्जिद विध्वंस 1992 के बाद पहली बार धार्मिक चैनल चलना शुरू हुआ असर यह हुआ कि व्यक्ति एक ही समय में कई टीवी प्रोग्राम देखने की कोशिश करने लगा टीवी के साथ रेडियो का दौर खत्म हो गया लेकिन बाद में टीवी के साथ भी यही होना था जब भारत में सर्वप्रथम 2016 में 4G की क्रांति आयी व्यक्ति अपने स्मार्टफोन पर अपेक्षाकृत ज़्यादा समय व्यतीत करने लगा तरह-तरह के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स...!!
भारत के व्यापक समाज में सबसे पहली दस्तक दी फेसबुक ने ततपश्चात ट्विटर ने, जो मानव एक शताब्दी पहले घण्टों किताब पढ़ सकता था भाषण सुन लेता था लगातार टीवी देखता था वह अब फेसबुक में रस गया और हर मिनट कुछ नया देखने की आस में बार-बार फ़ोन को देखता रहता लेकिन इसमें भी अच्छी बात थी यह कि मानव अभी तक सिर्फ़ मिनटों में कुछ नया देखने की आस लगाता था जमाने के साथ और विदेशी प्लेटफॉर्म्स भारत में आये इंस्टाग्राम, टिकटोक, मोज वीडियो, एमएक्स टकाटक, हेल्लो एप्प और न जाने और किन-किन नामों से सैंकड़ों एप्प भारत पहुँचे इन सब एप्स में सबसे प्रचलित हुआ म्यूजिकलि एप्प (बाद में टिकटोक) फेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब में आपको कुछ नया देखने पढ़ने के लिए कुछ न कुछ उंगलियों की गतिविधि करनी होती थी पर यह टिकटोक जैसे एप्प्स जबसे आये इन्होंने मानवीय उंगलियों को इतना आराम दिया जितने के वह क़ाबिल भी नहीं थे बस एक स्क्रॉल और तुरंत दूसरा वीडियो सिर्फ एक स्क्रॉल न कोई सर्च न ही कुछ करने की ज़रूरत इस आराम के मनोरंजन से व्यक्ति काफ़ी मनोरंजित होने लगा और देखते ही देखते खड़ूस रिश्तेदारों से लेकर बच्चों तक इन एप्प्स की पहुँच हो गयी ज़ाहिर सी बात है जवान देश भारत के युवाओं को इसमें गंभीर रुचि लेनी ही थी।
इस आरामदायक सुविधाओं से भी संयम व धीरज बच जाता पर जो यह हर 10-15 सेकंड में कुछ नया देखने की लालसा व्यक्ति को हुई यह ही घातक थी इन एप्स में हर 10 सेकंड बाद नया वीडियो देखना मानव को अधीर बनाने के लिए काफ़ी था असर तो यह भी होने लगा कि व्यक्ति एक 10 मिनट के वीडियो को भी देखने में अचरज में पड़ जाता है आपने भी महसूस किया होगा कि कई बार हम देखते तो स्क्रीन पर हैं लेकिन हमारा ध्यान कहीं और ही होता है... महसूस किया न? अगर किया तो बधाई हो आपने भी अपना ध्यानकेंद्रण खो दिया है यही कारण है कि व्यक्ति के लिये अब किताब के 2 पन्नों को पढ़ना कितना मुश्किल है और 1 घण्टे फ़ोन पकड़कर देखना कितना आसान.. अरे किताब तो दूर फ़ोन पर लंबी बात करना तक काफ़ी जटिल लगने लगा है, इन हर सेकण्ड्स में कुछ नया देखने की लालसा ने ही आपके अटेंशन स्पैन को निशाना बनाया आपका ध्यानाकेंद्रण आपसे छीन लिया जिस प्रकार ट्विटर में कम सीमित शब्दों में पूरी समस्या पूरी बात का ग्रहण करने का असफ़ल प्रयास किया वैसे ही इन सेकंड्स में नये वीडियो में पूरी कहानी का असफ़ल प्रयास किया है लेकिन यह मानव के ध्यान को आकर्षित करने में सफ़ल रहा है । व्यक्ति का अब एवरेज टाइम स्पैन मात्र 8 सेकंड बच गया है अर्थात अगर इंसान एक शिकारी जंतु होता तो शायद भुखमरी से मर जाता यह तुलना तो संयम, धीरज, ध्यान को बार-बार दर्शाती है ।
असल में इन 10-15 सेकंड वीडियो वाले एप्प्स को देखते समय आपका दिमाग स्विच ऑफ हो जाता है आँखे तो टिकी रहती हैं पर ध्यान केंद्रित नहीं रह पाता जिससे पढ़ाई, लिखना, मेडिटेट कर पाना बहुत मुश्किल हो जाता है इसके साथ-साथ याददाश्त पर भी घाव हुआ है ।
अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन के अनुसार तकनीक का ज्यादा उपयोग ब्रेन सिस्टम, कनेक्टिंग इमोशनल प्रोसेसिंग, अटेंशन स्पैन व डिसिशन मेकिंग प्रोसेस को क्षति पहुँचाता है ।
अब आप शायद समझ गए होंगे कि हर फ़िल्म में कंप्यूटर हैकर्स समाज से इतने अलग क्यों नज़र आते हैैं । ज्यादा सोशल मीडिया पर समय व्ययतीत करने वाला व्यक्ति गंभीर चिंता में जाने लगता है यह अनुभव मेरा स्वयं का भी है ।
Phantom vibration syndrome तो अब एक परसेप्शन है जिसमें यह महसूस होता है कि फ़ोन वाइब्रेट हो रहा है पर होता नहीं है ।
हालांकि व्यक्ति का नशा व्यक्ति के भीतर ही होता है लेकिन आप अपने ध्यानकेंद्रण की शक्ति को बढ़ायें आवश्यक हो तो दिन में 10 मिनट ध्यान/मेडिटेशन अवश्य करें या किताब पढ़ें यह आपके ध्यानकेंद्रण को वापस ले आएगा ।
लेकिन इन वीडियो मेकिंग एप्स का एक सकारात्मक पहलू यह भी है कि इन एप्स ने समाज के सभी वर्गों को इस बार मौका दिया है ताकि वह अपने बचत समय में ज़रा क्रिएटिव हो सकें प्रदर्शन कर सकें यह आत्मविश्वास बढ़ाने व सामाजिक मतभेद-भेदभाव मिटाने का एक अच्छा माध्यम बन सकता है और इस सकारात्मक पहलू को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है ।
संदर्भ -
सराहनीय
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