आख़िर कौन है शेर सिंह राणा?

                                                                  
शेर सिंह राणा इस नाम को किसी परिचय की आवश्यकता तो होनी नहीं चाहिए थी पर हालात ऐसे हैं कि परिचय की आवश्यकता है। यह 21वीं शताब्दी के वीरों में से एक हैं जिन्होंने देश की गरिमा के लिए कुछ किया बल्कि शताब्दी की शुरुआत में ही यह बेड़ा उठाया अब अगर बात वीरता की होनी ही है तो आइए एक महावीर की कहानी सुनते हैं।


सम्राट पृथ्वीराज चौहान (अंतिम हिन्दू सम्राट) -
पृथ्वीराज चौहान का जन्म 1149 में हुआ था वह अजमेर के राजा सोमेश्वर के पुत्र थे वह काफ़ी कम उम्र में ही राजा बन गए थे हालांकि उन्हें कुछ वर्षों बाद दिल्ली की गद्दी भी मिल गयी थी उनका विवाह राजकुमारी संयोगिता से हुआ था वैसे इनके विवाह की कहानी भी अलग ही वीरता से परिपूर्ण है। अज़मेर की पड़ोसी रियासत ग़जनी का सुल्तान मुहम्मद शहाबुद्दीन गोरी अजमेर व दिल्ली जीतने की चाह में बार-बार आक्रमण करता और लगातार पराजित होता यह पराजित होने का सिलसिला 17 बार चला तब शायद गोरी को यह समझ आ चुका था कि घर का भेदी ही लंका ढा सकता है इसलिए गोरी ने पृथ्वीराज चौहान के ससुर जयचंद से संपर्क किया जयचंद की नज़र पहले से ही दिल्ली की गद्दी पर थी वह उसे पाने की लालसा तो रखता था पर हिम्मत नहीं, गोरी के संदेश से जैसे उसे अवसर मिल गया हो उसने गोरी के साथ मिलकर चौहान की सेना को दो तरफ़ा वार करके जीतने का नियोजन किया और वह इसमें सफ़ल भी हुए, तुर्की योद्धाओं व सुल्तानों से तो एक बात सीखनी पड़ेगी कि वह जल्दी हार नहीं मानते थे फिर चाहे वह सोमनाथ मंदिर को 16 बार लूटने वाला महमूद आमिर ग़ज़नवी हो या मोहम्मद शाहबुद्दीन गोरी। पृथ्वीराज चौहान के पराजित होने के बाद उन्हें घायल करते हुए ग़जनी ले जाया गया वहाँ उन्हें जंजीरों की जकड़न के साथ आँख फोड़कर अंधेरे क़ैद में छोड़ दिया और दिल्ली की गद्दी अपने सेनापति कुतुब्दीन ऐबक को सौंप दिया यह वही शासक है जिसने बाद में कुतबमीनार बनवाई। 
चौहान साहब के एक बड़े अच्छे मित्र थे कवि चंदबरदाई उन्हें चौहान जी की यह हालत सहन नहीं होती थी इसलिए वह एक दिन ग़जनी के लिए निकल चले सुल्तान के समक्ष पहुँच कर उन्होंने ने अपना परिचय दिया और बताया कि आपका कैदी चौहान शब्दभेदी बाण (आवाज़ सुनकर तीर चलाने की कला) चलाने का महारथी है सुल्तान के लिए यह नया कारनामा था वह देखने को आतुर हो उठा, चंदबरदाई को चौहान से कैद में मिलवाया गया फिर एक जलसा कराया गया जिसमें चौहान को एक बड़े से स्टेडियम में लेकर आया गया दर्शकों से पूरा स्टेडियम भर गया और हमेशा की तरह एक ऊँचे लकड़ी के मचान पर सुल्तान करतब देखने हेतु विराजित हुआ, चौहान ने तीर-कमान हाथ में ली करतब शुरू करने का हुक्म हुआ इतने में चन्दबरदाई ने अपनी कविता का सर्वोत्तम उपयोग करते हुए चिल्लाये "चार बाँस चौबीस गज अंगुल अष्ट प्रमान.. ता ऊपर है सुल्तान... मत चूको चौहान" बिजली की गति रूपी प्रतिक्रिया में चौहान ने फुर्ती से तीर चलाया सभी दर्शक चौंक उठे सैनिक सावधान हो गए सारी सल्तनत में मानों खलबली मच गई क्योंकि चौहान द्वारा छोड़ा गया वह तीर सीधा सुल्तान गोरी की छाती को चीर चुका था सैनिकों ने देर न करते हुए दोनों मित्रों को मौत के घाट उतार दिया।
                                                    सन - 1192
                                      
 इसके बाद सुल्तान की कब्र बनवाई गई पर सुल्तान की कहानी तो बिना चौहान के अधूरी ही थी इसलिए सुल्तान की कब्र के पास सम्राट चौहान और मित्र कविवर चन्द्रबरदाई की कब्र भी बनवाई गई पर स्मृति के तौर पर बिल्कुल नहीं बल्कि रोज़ाना अपमान व नफ़रत की भोग चढ़ाने के लिए जब भी लोग सुल्तान की मजार पर ज़ियारत के लिए जाते तो बाहर स्थित दोनों की कब्र पर जूते पीटते और अपमान करने की कोशिश करते और यह प्रथा 800 वर्षों बाद भी इस शताब्दी में भी जारी थी और जारी रहती अगर शेर सिंह राणा जैसे सपूत जन्म न लेते। 


शेर सिंह राणा - 
शेर सिंह राणा उर्फ़ पंकज सिंह इनका जन्म रुड़की जिला हरिद्वार (उत्तराखंड) में 17 मई 1976 को दिन हुआ था और वह अच्छे और सम्पन्न परिवार से हैं, इनके बचपन के बहुत से किस्से आपको इनकी आत्मकथा "जेल डायरी" में मिल जायेंगे। लेकिन शेर सिंह राणा का नाम लाइमलाइट में तब आया जब दिल्ली में 25 जुलाई 2001 की सुबह अचानक सांसद फूलनदेवी की हत्या उनके ही घर के सामने हो गयी और हत्या की जिम्मेदारी शेर सिंह राणा ने लेते हुए कहा कि उन्होंने बेहमई हत्याकांड का बदला लेने के लिए सांसद फूलनदेवी की हत्या की है, इस आरोप के लिए उन्हें एशिया की सबसे सुरक्षित तिहार जेल दिल्ली में बंद किया गया वह तीन साल तक तिहार जेल में ही थे तभी उस समय कई दिग्गज नेता व वि.हि.प के नेता पृथ्वीराज चौहान साहब की वही अस्थियां अफ़ग़ानिस्तान से वापस लाने की बात करते थे क्योंकि सुल्तान गोरी की ज़ियारत के नाम पर चौहान जी का अपमान पूर्ण भारत का अपमान था शेर सिंह राणा आये दिन अखबारों में इन्हीं अस्थियों के बारे में सुनते शायद इसी से उन्हें यह प्रेरणा मिली होगी कि उन्हें वह अस्थियाँ वापस लाकर भारत का सम्मान बढ़ाना चाहिए लेकिन वह तो जेल में थे किसी सामान्य इंसान की हिम्मत व सहनशीलता की पराकाष्ठा लाँघने के लिए ही कैद में किये जाने का रिवाज़ बनाया गया था लेकिन राणा जी कोई आम इंसान नहीं थे उनकी आत्मकथा पढ़ते हुए हमेशा यह महसूस हुआ कि वह सदैव ऊर्जा और जज़्बे से लबालब भरे हुए थे और अपने लक्ष्य के प्रति कर्मठ थे उनका निर्णय इतना अडिग न था फ़िर तीन सालों बाद 17 फ़रवरी 2004 को सुबह ही खबर आयी कि "फूलन का हत्यारा शेर सिंह राणा तिहार जेल से फ़रार" वैसे एक बार राणा जी ने कहा भी था "मैं जब चाहूँ यहाँ से निकल सकता हूँ" आखिरकार वह सफ़ल हुए लेकिन वह इनका दूसरा प्रयास था पहले प्रयास में वह कुछ गद्दार मुखबिरों की वज़ह से असफ़ल हो चुके थे ख़ैर वह जेल से भाग निकले लेकिन वह किसी व्यक्तिगत कारण या ऐशो-आराम के लिए नहीं बल्कि पृथ्वीराज चौहान की अस्थियाँ अफ़ग़ानिस्तान से वापस लाने के लिए जेल से भागे थे। 
                 राणा जी तिहार से भागने के बाद राँची, कोलकाता आदि नगर होते हुए बांग्लादेश पहुँचे कुछ समय व्यतीत वहीं किया फिर दुबई और उसके बाद अफ़ग़ानिस्तान में काबुल शहर पहुँच गए वहाँ उनकी तलाश जिस मजार की थी वहाँ की कोई भी जानकारी राणा जी के पास नहीं थी क्योंकि उस मजार शायद ही कोई भारतीय कभी गया होगा शायद क्या बल्कि गया ही नहीं होगा!! राणा जी के सामने चुनौतियाँ कम नहीं थी पर उस विशाल हिमालय रूपी अडिग जज़्बे और दृढनिश्चय के सामने चुनौतियाँ सिर्फ़ हवा के झकोरे के समान थी परंतु फिर भी उन्हें अफ़ग़ानिस्तान में किसी 800 साल पुरानी मजार को खोजना आसान न था आखिरकार महीनों व्यतीत करने के बाद वह मज़ार उन्हें ग़जनी शहर के पास देयक गाँव में होने का पता चला और साथ में यह भी पता चला कि देयक गाँव तालिबानी आतंकियों के इलाके में हैं उस गाँव के लोग भी तालिबानी समर्थक थे। तालिबानी इलाके में एक हिन्दू का जाकर वापस आना मात्र ही बहुत अचंभित करता है पर राणा जी को तो अस्थियाँ भी वापस लानी थी पर तालिबानियों व अफगानियों की नज़र से तो यह चोरी ही थी न और उनके लिये किसी की जान लेना कौन सी नई बात है, ख़ैर राणा उस देयक गाँव गये और और बतौर दर्शक ज़ियारत की और चौहान साहब, चंद्रबरदाई, गोरी की कब्र पहचानी साथ ही इलाके को पहचाना गाँव के रास्ते आदि देखे क्योंकि उन्हें आगे का नियोजन करना था और वह अब तक अकेले थे हालांकि वह कई अफ़ग़ानिस्तान के हिन्दू और सिख लोगों से मिले पर उनपर भय हावी था इसलिए कोई तैयार न हुआ फिर बाद में डेविड और ऑर्थो नाम के दो अमरिकी लड़कों से उनका परिचय हुआ अंत में डेविड राणा जी के साथ अस्थियाँ निकाल कर लाने के लिए तैयार हुआ और इस काम को अंजाम देने के लिये दोनों एक सर्द भरी रात चुनी वह छुपते-छिपाते गाँव से मज़ार तक जा पहुँचे और अंततः दोनों निडर लड़कों ने अंजाम दिया साथ ही खुदाई की वीडियोग्राफी भी की और एक बोर्ड के साथ गोरी की कब्र में लगा हुआ एक रत्न भी सबूत के तौर पर लाये।
                      राणा जी के उस गाँव के अनुभव इतने भी अच्छे न थे पर रोमांचक जरूर थे इसके लिए आपको 'जेल डायरी' अवश्य पढ़नी चाहिए। शेर सिंह राणा दुबई होते हुए बांग्लादेश वापस पहुँचे, वह कई नेताओं के संपर्क में थे पर वह अस्थियाँ वह किन्हीं जिम्मेदार हाथों में सौंपना चाहते थे क्योंकि उन्हें पुलिस पर अब भरोसा न था तभी मैनपुरी (उ.प्र) के पूर्व विधायक श्री उपदेश सिंह को इसकी जिम्मेदारी दी हालांकि पृथ्वीराज चौहान का स्मारक तो दिल्ली में बनना था पर कुछ कारणों से वह बेवर-कानपुर हाईवे के नज़दीक 5 एकड़ की विशाल भूमि पर बना। इसी बीच राणा जी कोलकाता पहुँच चुके थे और 2 साल से उनके पीछे लगे एक पुलिस अफ़सर को यह जानकारी मिल चुकी थी सन 2006 में शेर सिंह राणा गिरफ्तार हुए।

                          
  हालांकि इन तस्वीरें देखकर लगता तो नहीं कि वह अचानक पकड़े गए थे पर खबरों के अनुसार तो ऐसा कह सकते हैं। सन 2006 में गिरफ्तार होने के बाद से उन्हें दिल्ली स्थित रोहिणी जेल में रखा गया, अक्टूबर 2016 को अदालत से बेल मिल गई और फ़रवरी 2018 में विवाह भी किया


और वह अभी राष्ट्रवादी जनलोक पार्टी (सत्य) के राष्ट्रीय संयोजक हैं और आज भी उसी निडरता से सरकार की गलत नीतियों का विरोध करते हैं क्योंकि शस्त्र चलाना मात्र ही वीरता नहीं बल्कि अपनी चुनौतियों का सामना करना भी वीरता ही है।



लेकिन शेर सिंह राणा की कहानी बिन फूलनदेवी के आधी ही रह जायेगी और आख़िर वह बेहमई हत्याकांड क्या था जो एक सांसद की हत्या का कारण बना, आपको भी जिज्ञासा हो गयी होगी नहीं भी हुई होगी तो भी आइये जानते हैं।

बेहमई हत्याकांड और जातिवाद का ज़हर - 
आपने मशहूर डकैत फूलनदेवी का नाम तो सुना ही होगा नहीं सुना तो अपने परिजनों के साथ बैठना-बताना शुरू कीजिए वर्ना कुछ नहीं जान पायेंगे।
फूलन का जन्म 1963 में जलौन जिले (उ.प्र) के एक छोटे से गाँव में जन्म हुआ था वह मल्ला जाति से आती थी बचपन से ही तथाकथित ऊँची जातियों विशेषतः इलाके में दबदबे वाले ठाकुरों के जातिवाद का शिकार बनी थी बल्कि पूरे मल्ला जाति के लोग ही शोषित होते थे, 1974-75 में घर की गरीबी की वज़ह से फूलन की 11 वर्ष जैसी कम आयु में उससे 25-30 वर्ष बड़े युवक से शादी करा दी जाती है ससुराल के दबाव व मारपीट में उसका दम घुटता था पर फूलन सहने वालों में से न थी वह बचपन से ही काफ़ी तेज़ स्वाभाव की व मुँहफट्ट थी तंग करने पर पत्थर मार-देना गाली दे देना उसे तत्कालीन लड़कियों से अलग बनाता ही था इसलिए आसपास लोग उसे जानने लगे थे फूलन से ससुराल छोड़ दिया वापस अपने घर आयी फ़िर किसी जमीनी विवाद के मसले में या अपनी इच्छा से वह बागी (डकैत) बन गयी या डाकुओं द्वारा अपहरण से फूलन डाकुओं से जा मिली यह आज भी रहस्य है इस बारे में फूलन ने साफ तौर पर कभी नहीं बताया "भगवान की इच्छा थी तो पहुँच गये" ऐसा ही कुछ जवाब था एक इंटरव्यू में।
              बागी के साथ रहने की वज़ह से उसे डाकुओं के सरदार की हवस का शिकार जबरजस्ती के साथ बनना पड़ा फ़िर उसी गैंग के एक मुख्य सदस्य विक्रम मल्ला के साथ फूलन ने प्रेम किया तथा बाद में इन दोनों ने एक अलग गैंग बनाई तभी दो डाकू भाई श्रीराम और लालाराम जेल से आज़ाद हुए तभी उन्होंने फूलन पर गलत नज़र रखते हुए पहले तो विक्रम मल्ला का खून किया फिर फूलन को अपने साथ कानपुर जिले के बेहमई गाँव ले गए फूलन के साथ वहाँ जमकर अनाचार किया गया कहा जाता है उन 2-3 हफ्तों में 3 दर्जन से ज़्यादा लोगों ने फूलन के साथ दुष्कर्म किया, एक दिन डाकू श्रीराम व लालाराम भाइयों उसे नग्न अवस्था में गाँव के कुएँ से पानी भरकर लाने कहा उसे मजबूरन जाना पड़ा सारी गाँव की नज़रों के सामने, यह चित्र किसी के भी मन में प्रतिशोध की ज्वालामुखी धहकाने के लिए काफ़ी है, मौकापरस्त फूलन एक दिन भाग निकली और फिर वह जाकर विक्रम मल्ला के डाकू दोस्त मान सिंह से जा मिली और कुछ लोगों को साथ में लेकर अपनी गैंग बनायी गैंग बनाने के साथ ही उसने कई डकैतियों को अंजाम दिया उस पर आरोप भी लगते थे कि वह ऊँची जातियों विशेषतः ठाकुरों को ज़्यादा निशाना बनाती थी हर लूट के साथ भय क़ायम करने के लिये 1-2 हत्याएँ भी करती पर यह सब फूलन की प्रतिशोध को ठंडा करने के लिये काफ़ी न था फूलन ने अपने जीवन में हमेशा बदले के लिये एक विशेष जगह बनाई थी वह श्रीराम और लालाराम से बदला लेना चाहती थी जो कि सही भी था यह कोई संदेहास्पद बात नहीं है कि वह क्यों किसी की जान लेना चाहती थी। 14 फरवरी 1982 उसे ख़बर मिली कि बेहमई गाँव में एक शादी हो रही है और डाकू श्रीराम व लालाराम दोनों भाई भी आमंत्रित हैं फूलनदेवी मान सिंह आदि साथियों को तैयार कर बेहमई गाँव में धावा बोल दिया लूट-खसोट शुरू किया फिर दोनों भाईयों को खोजने लगी लेकिन उस शादी में श्रीराम व लालाराम दोनों नहीं मिले पर उनकी गैंग के दो डाकू मिले तुरंत जान ली गयी इसके बाद फूलनदेवी क्रोध में बौखला रही थी उसने गाँव के कुछ मर्दों को घसीटकर बाहर उसी कुएँ के पास निकलवाया जहाँ उसे नग्न अवस्था में पानी भरने जाना पड़ा था और उनसे पूछा 'श्रीराम का राशन पानी इस गाँव से कौन-कौन देता है'  ग्रामीणों ने कहा 'तू तो जानती है फूलन कौन देता है' तो उसने कहा 'हाँ' फिर श्रीराम व लालाराम का पता पूछा और ग्रामीणों द्वारा जवाब न मिल पाने की वजह से उसने सभी को कतार में खड़ाकर नारा लगाया "काली माई की जय" और गोलियों से भून दिया... 
                         धूल, बारूद, खून के छींटों के नजारे बहुत भयावह थे इसी अफरा-तफरी में एक व्यक्ति वहाँ से बचकर निकला भी और एकलौता चश्मदीद गवाह भी बना इस हत्याकांड में कुल 22 लोगों की मृत्यु हुई साथ ही घर के आँगन में झूले पर सो रही बच्ची को उठाकर ज़मीन पर पटक दिया बाद में वह बच्ची विकलांग होकर 2008 में खत्म भी हो गयी ये 22 मृतक सभी ठाकुर थे शायद यह आज भी आज़ाद भारत का सबसे बड़ा हत्याकांड हो लेकिन जातिवाद ज़हर का तो सबसे बड़ा हत्याकांड है ही। फूलनदेवी श्रीराम और लालाराम के बदले में उन 22 निर्दोषों को जान से मारना और दुधमुंही बच्ची को विकलांग करना उसे किसी भी समाज में नायिका या प्रतिनिधित्व के पद में नहीं ठहरने देगा वह इतिहास के लिए महज़ एक ज़ालिम डकैत ही है। बेहमई हत्याकांड बहुत बड़ी घटना थी इसने पूरे देश का ध्यान खींचा अर्थात इनके पीछे पुलिस ने पूरी शक्ति झखझोर कर रख दी पर 2 सालों तक पुलिस फूलनदेवी को न पकड़ सकी आख़िरकार तत्कालीन मुख्यमंत्री व एसपी ने बौद्धिकता से फूलनदेवी को आत्मसमपर्ण के लिए तैयार किया लेकिन कुछ शर्तें रखी और मुख्यमंत्री ने स्वीकार किया 1983 में फूलनदेवी ने मुख्यमंत्री के सामने जाकर उनके पैरों पर अपनी बंदूक रख कर आत्मसमपर्ण किया फिर वह सन 1994 तक जेल में थी फिर निकली सांसद बनी अंततः 2001 में हत्या हो गई।

कई बार मैंने देखा है कि कुछ लोग फूलनदेवी को एक क्रांतिकारी की तरह देखना चाहते हैं देखते हैं, फूलनदेवी को मैंने हमेशा दो नौकाओं पर पैर रखे देखा जब एक समय था वह जातिवाद से तंग आकर विरोध करती थी लेकिन जब श्रीराम और लालाराम डाकू बेहमई में नहीं मिले तब फूलनदेवी का उन 22 चुनिंदा जाति विशेष के निर्दोषों को मारना क्या जातिवाद नहीं होगा? आखिर यही नफ़रत और श्रेष्ठताबोध ही जाति व्यवस्था को जातिवाद में बदल चुका है, और अगर फूलनदेवी के मन मे जाति विशेष को लेकर इतनी नाराज़गी थी तो आत्मसमपर्ण के दौरान तो मुख्यमंत्री भी उसी जाति के थे जिनके लिये फूलनदेवी के मन में विशेष नफ़रत थी मगर मुख्यमंत्री फूलनदेवी की सभी मांगे पूरी करने पर तैयार थे तब मुख्यमंत्री के समक्ष में फूलनदेवी का हथियार चरणों में डालकर आत्मसमपर्ण करना उसे लालच व भय के साथ में खड़ा करता है जबकि उसके साथी रहे मान सिंह आदि आज भी फ़रार हैं। कुछ महिलावादी भी समर्थन में खड़ी होती हैं तो उन्हें तब उस दुधमुंही बच्ची को भी याद रख कर ही राय बनानी चाहिए जिसने विकलांग होकर अपनी मृत्यु को प्राप्त किया।
           सिस्टम या सामाजिक रूढ़िवाद विरोध के अपने तरीके होते हैं ऐसे समय में बिना मूल्यांकन के किसी को भी महान बना लेना गलत व गैर-ज़िम्मेदाराना हरक़त है, जैसे कई सोशल मीडिया वाले नेता गाँधी जयंती के दिन हत्यारे गोडसे को याद करना चाहते हैं तो कुछ अम्बेडकर जयंती को "मूर्ख जयंती" के रूप में मनाने का स्वप्न देखते हैं क्या वाकई में आज हम 21वीं शताब्दी में भी जातिवाद से परे नहीं उठ पाये हैं। 
 
अब बेहमई में जिस जगह पर हत्याकांड हुआ था उस जगह पर अब एक स्मारक बना दिया गया है। 

गाँव के राजाराम सिंह ने रपट दर्ज करायी थी और गाँव के लोग जान का खतरा होने के बावजूद आज भी केस लड़ रहे हैं गवाही भी दे रहे हैं मगर आज 4 दशकों बाद भी न्याय नहीं मिला न ही किसी परिवार को कोई पेंशन न ही कोई मुआवजा जबकि परिवार के मुखिया के जाने बाद आजीविका का प्रबंध किस हद तक मुश्किल हो सकता है यह तो आप हम जानते हैं वहीं मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव द्वारा डाकू फूलनदेवी को जेल से निकालने के बाद सांसद बन जाना, इन राजनीतिक दांव-पेंचो से आज भी ग्रामीण खुद को ठगा पाते हैं।





धन्यवाद।








सन्दर्भ -









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