गाँजे की दर्द भरी दास्तां
गाँजा, माल, स्टफ, पॉट, ग्रास, मेरुआना आदि नाना प्रकार के नाम जिस शब्द के हैं उसका असली वैज्ञानिक नाम है कैनेबिस-सटाईवा इसकी एक और प्रजाति होती है "कैनेबिस-इंडकस" जिससे भाँग बनाया जाता है। भारत में इन दोनों पदार्थों के सांस्कृतिक रूप के अपने अलग मायने हैं हालांकि भारत में सांस्कृतिक रूप में हर चीज़ के अपने सुविधानुसार अलग मायने ही हैं किसी को महुआ शराब की आवश्यकता है तो किसी को बलि की किसी को शाकाहार की लेक़िन इन सबसे बिल्कुल विपरीत भाँग, गांजे के वैदिक सभ्यता से भी महत्वपूर्ण है और हजारों वर्षों के इसके उपयोग भी मिल जाते हैं। गाँजा इसी पौधे के सूखे फूलों को रगड़कर तैयार होता है चरस इस पौधे के रेज़िन से बनता है और भाँग पत्तों और बीजों से मिलाजुला कर।
अर्थवेद कांड 11, सूक्त 6 या 8, श्लोक 3177 में तो कैनेबिस को धरती के पाँच सबसे पवित्र पौधों में से एक बताया गया है यही नहीं बल्कि इसे खुशहाली और आनंद का स्रोत भी बताया गया है।
यह तो ऐसी बातें थी जो वेद में ग्रंथ में लिखी हुई हैं आइये अब उनको भी जानें जो विज्ञान की किताबों में लिखी हुई हैं।
आख़िर गाँजा नशा कैसे करता है?
गाँजा साइकोएक्टिव ड्रग की श्रेणी में आता है अर्थात यह हमारे मस्तिष्क में ऐसी हरकतें करता है जिससे हम हाई या चांड महसूस करते हैं, कैनेबिस में 150 प्रकार के कैनाबिनोइड्स मिलते हैं जिसमें से मुख्यता व प्रचुरता में पाये जाते हैं THC (Tetrahydrocannabinol) व CBD इन दोनों जोड़ी की तरह काम करते हैं दो अच्छे दोस्त की तरह इनमें से THC जो होता है उसकी वज़ह से ही हमें नशे का एहसास होता है नशे के लिए यही जिम्मेदार कारक है और वहीं CBD इसके विपरीत कार्य करता है नशा कम करने की कोशिश करता है आनंद प्रदान करता है भय, चिंता आदि से मुक्त करता है।
THC & CBD की कार्यप्रणाली -
हमारे मस्तिष्क में जो भी संचार होते हैं वह न्यूरॉन्स के ज़रिए होते हैं मतलब दिमाग़ के एक हिस्से से दूसरे हिस्सों तक भी न्यूरॉन्स कार्य पर लगे रहते हैं, इन न्यूरॉन्स पर कैनबिनोइड्स रिसेप्टर होते हैं इन्हीं रिसेप्टर साइट पर जाकर THC व CBD कुछ स्थानों पर जाकर बैठ जाते हैं इसी दौरान न्यूरॉन्स के साथ खेल हो जाता है और नशा होने लगता है। लेकिन आप यह मत समझना कि न्यूरॉन्स पर तो कैनबिनोइड्स रिसेप्टर्स पहले से ही मौजूद है दिमाग गाँजा चाहता है.. असल में कुछ कैनबिनोइड्स का उत्पादन हमारे शरीर में ही होता है यह रिसेप्टर्स इन्हीं कैनबिनोइड्स के लिए होते हैं जैसे हमारे शरीर में उतपन्न होने वाला कैनबिनोइड है आनंडमिनाइड यह संस्कृत के 'आनंद' शब्द से लिया गया है जब हम कसरत करते हैं या भागते हैं तब यही उतपन्न होता है तभी हमें थोड़ी खुशी महसूस होती है अच्छा लगने लगता है गाँजे का THC इसी आनंडमिनाइड कैनबिनोइड की नकल करता है गाँजा फूंकने के दौरान इसका THC हमारे खून में मिलकर हमारे दिमाग तक पहुँचता है और जिन हिस्सों में रिसेप्टर्स अधिक होते हैं उन हिस्सों में यह असर करता है उन्हीं हिस्सों से जुड़े फंक्शन ही प्रभावित होते हैं हालांकि हर व्यक्ति पर अलग अलग असर करता है।
गाँजे का राजनीतिक चीरहरण -
सन 1961 में UN में बैठक हुई और गाँजे को सिंथेटिक ड्रग की श्रेणी में डाल दिया गया सिंथेटिक ड्रग में हेरोईन, ड्रग्स, ब्राउन सुगर आदि भी आते हैं सिंथेटिक अर्थात लैब में बना हुआ लेकिन गाँजे को इस श्रेणी में किस वज़ह से डाला गया यह अपने आप में ही सवाल हो जाता है क्योंकि गाँजा तो पौधे से उत्प्न्न होता है न, फिर बारी-बारी विश्व भर में इसे बैन करने की माँग की लेकिन भारत की सरकार ने इस पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया क्योंकि गाँजा, भाँग हमारे देश की संस्कृति में सन्नहित है फिर आख़िरकार UN, USA के दबाव में राजीव गाँधी सरकार ने लाया NDPS (Narcotic Drugs and Psytropic Substances Act 1985) उसके बाद से इसे बैन तो किया गया पर इसपर उतनी कड़ाई नहीं दिखाई गई क्योंकि जैसा कि आप जानते हैं गाँजा, भाँग हमारी संस्कृति में से एक है और इस पौधे का उपयोग करके उस समय तक भी काफी आयुर्वेदिक दवाई बनाई जाती थी बल्कि इस कैनेबिस के पौधे को 'Backbone of Ayurved' और 'Penicillium of Ayurved' भी कहा जाता है इसकी उपयोगिता आयुर्वेद में आज भी उतनी ही है।
बैन करवाया अमेरिका ने लेकिन आज अमेरिका के अपने 27 राज्यों में यह औषधि उपयोग के लिए पूर्णतः लीगल है वहीं अन्य 11 राज्यों में रीक्रियेशनल उपयोग (आनंद के लिए) यह लीगल है साथ ही विश्व भर में यह 40 से अधिक देशों में यह लीगल है और यह भी कोई असामान्य बात नहीं कि ग्रॉस हैप्पीनेस इंडेक्स की सूची में यह देश भारत से काफ़ी ऊपर हैं।
अमेरिका में जब से यह लीगल हुआ तब से वहाँ पेन किलर और शराब उपभोग में तो 10% तक की कमी पायी गयी इन आंकड़ों को देखकर ही कयास लगायी जा सकती है कि यह फार्माक्युटिकल, शराब, तम्बाकू उद्योगों की चाल थी अपने बाजार को बढ़ाने के लिए गाँजे को रोकना जरूरी था मुझे तो शक है कि इन उद्योगों ने ही ऐसे समाजसेवा के नाम पर ठगने वाले NGOs को पैसे देते हैं ताकि वह गाँजे को लेकर एक नकारात्मक माहौल बनाये रखें, यह सब इतने गुप्त रूप से होता है कि इनका नाम या कोई साक्ष्य बाहर आना बहुत मुश्किल है।
लेकिन बैन होने के बावजूद सिर्फ़ हिमांचल में ही 60,000 कि.ग्रा का उत्पादन होता है जिसमें से मात्र 1% ही पकड़ा जाता है यही नही बल्कि वैश्विक स्तर पर दिल्ली और मुंबई क्रमशः 3 और 6वें सबसे अधिक उपभोग करने वाले शहरों में महारथी हैं।
कैनेबिस पौधे के गुणों पर भी चर्चा होनी आवश्यक है -
1. यह पौधा गैस्ट्रिक, मोटापे, मधुमेह, हैजा, पीलिया, पेन किलर के साथ-साथ गुप्त रोगों में भी फायदेमंद है बल्कि इससे कैंसर की दवाएँ भी बनती हैं और इसे एपेटाईज़र के रूप में भी प्रयोग कर सकते हैं।
2. हेम्प उद्योग से फ़ूड सप्पलीमेंट और प्लास्टिक उत्पादन में भी मदद होती है।
3. 2017 में लीगल होने के बाद से यह अनुमान लगाया जा रहा था कि अमेरिका में हेम्प उद्योग से 2020 तक GDP में 3 लाख करोड़ की वृद्धि हो सकती है।
4. अनुमान इसका भी था कि हेम्प उद्योग मैनुफैक्चरिंग उद्योग को टक्कर देगा। परन्तु साबित करने के लिए अभी ऐसा कोई डेटा इंटरनेट पर उपलब्ध नहीं है।
5. इसका नशा शराब व तंबाकू से कम एडिक्टिव है।
6. लीगल होना सरकार को टैक्स के रूप में भी फायदेमंद होगा और जब यह लीगल होकर बिकेगा तो इन पदार्थों में THC व CBD की मात्रा भी इनके पैकेट पर लिखी होगी जो कि सुरक्षित साबित होगी जैसे शराब में एल्कोहल की मात्रा लिखी होती है।
सीमा से अधिक कोई भी चीज नुकसान करती है आप ज़्यादा पानी पियेंगे तो उल्टी कर सकते हैं ज़्यादा वेब सिरीज़ देखेंगे तो लगेगा गाली देना तो कूल है उसी प्रकार गाँजे के अधिक सेवन से भी याददाश्त, सीखना, इम्पल्स कंट्रोल, संरचनात्मक बदलाव आदि में नकारात्मक परिवर्तन आ सकते हैं। गाँजे पर बैन होने की वज़ह से इसपर बहुत कम शोध उपलब्ध है लेकिन फिर भी 20 साल से कम के बच्चों के सेवन करने से उमके दिमाग पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ता क्योंकि दिमाग तबतक विकसित होता रहता है और इतने जटिल मशीन से छेड़छाड़ करना ठीक नहीं यह बौद्धिकता गुणांक (IQ) का स्तर, सीखना, समझना, बोलने आदि का स्तर हमेशा के लिए गिरा देता है।
एक रिसर्च के अनुसार यह श्वासरोगी, गर्भवती व मानसिक रूप से बीमार रोगियों के लिए घातक साबित हो सकता है इन्हें इसका सेवन बिल्कुल नहीं करना चाहिए दूसरा इसका सेवन करने वालों को ध्यान रखना चाहिए कि इस पर निर्भर नहीं होना चाहिए निर्भरता वैसे ही बुरी चीज़ है।
धन्यवाद
यह लेख किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थों के सेवन को बढ़ावा नहीं देता न ही किसी पदार्थ के कानूनी या गैर-कानूनी होने के पक्ष में दावे करता है पाठक स्वयं के विवेक से तथ्यों से तय करें।
(और मैं गाँजा नहीं पीता हूँ, लेख पढ़कर मेरा चरित्र निधार्रण न करने की कृपा करें)
सन्दर्भ -


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