लव ज़िहाद

                                       भारत का समाज मूल रूप से प्रेम का विरोधी है भले वह गानों के नाम पर सिर्फ़ रोमांटिक गाने ही सुनता है पर वह गाने ख़त्म हो जाने के बाद पुनः इसी भय में जीता है कि उसके बच्चे-बच्ची, भाई-बहन, अन्य रिश्तेदार भी कहीं प्रेम करना न सीख जायें हालांकि वह नफ़रत करना भी नहीं सिखाता पर प्रेम से डरता है कि अगर कहीं घर के कम उम्र वालों इश्क़ हो गया तो बदनामी कैसे झेलेंगे, 'बदनामी' कैसी?? वैसे उस समाज से प्रेम की उम्मीद भी क्या करनी जहाँ 90% रिश्ते दहेज के दम पर बनते हैं कभी झाड़ियों के बीच छिपकर मिलते प्रेमी युगल का वीडियो वायरल हो जाता है तो कभी एक साधु के वेश में भगवा चोला पहने एक गुंडा उन युगल को पीटता, अपशब्द कहता दिखाई पड़ता है आपको 3 साल पहले का दिल्ली के अंकित सक्सेना हत्याकांड भी जानना चाहिए और कोयम्बटूर के कौशिल्या व शंकर प्रेम को भी कि आखिर कैसे अलग मज़हब और जाति से प्रेम करना भारी पड़ा।समाज जाति, धर्म या शादी के बंधन में प्रेम को कितना ही बांधने की कोशिश कर ले वह सदैव नाकामयाब ही रहेगा पर प्रेम को नियंत्रित करने के लिए आजकल कानून भी बन चुका है, 27 अक्टूबर 2020 को निकिता तोमर के साथ फरीदाबाद में हुए अपराध के बाद लव ज़िहाद कानून की माँग होने लगी थी।
28 नवंबर 2020 को उ.प्र विधानसभा से "UP Prohibition Of Unlawful Conversion Of Religion Ordinance 2020" नाम का कानून पारित हुआ इसके तहत अगर कोई मुस्लिम युवक किसी युवती को स्वयं द्वारा Misrepresentation, Force, Undue, Influence, Coercion, Allurement, Fraudulent तरीके से शादी के बाद युवती का धर्म परिवर्तन कराता है तो 1 से 10 साल तक की क़ैद व 50,000 रु. जुर्माना भुगतान करना होगा और यह एक गैर-ज़मानती अपराध होगा। पर इस क़ानून की ज़रूरत क्या थी? आपने भी कभी न कभी अपने whatsapp पर 'लव ज़िहाद' वाला मैसेज पढा होगा और साम्प्रदायिकता के आवेश व सूचनाओं के अभाव में आकर इसे सच अवश्य माना होगा कम से कम मेरे साथ तो ऐसा ही हुआ था लेक़िन 2014 में मैंने यह मैसेज पढ़ा था फिर forward भी किया था पर घबराइए मत अब मैं आपको निष्पक्ष सच बताऊँगा।

सबसे पहले इस तरह का प्रयास गुजरात के भाजपा नेता बाबू बजरंगी द्वारा मिलता है जिसमें उन्होंने गुजरात में पोस्टर्स लगवाए थे कि मुस्लिम युवक विदेशी साजिश के तहत हिन्दू युवतियों से प्रेम का झलावा कर पहले तो निक़ाह करते हैं फिर धर्म परिवर्तन कराते हैं लेकिन उस समय कोई 'लव ज़िहाद या रोमियो ज़िहाद' शब्द नहीं सुना गया। 
लव ज़िहाद/रोमियो ज़िहाद (ज़िहाद का अर्थ - संघर्ष) शब्दों की उत्पत्ति समझने के लिए आपको आज से 12 साल पहले जाना होगा सन 2009 में कैथोलिक बिशप कॉउंसिल ने दावा किया कि 2009 तक केरल व समुद्र तटीय कर्नाटक में 4,500 से अधिक क्रिस्चियनों का धर्मांतरण किया जा चुका है इसके बाद उसी साल हिन्दू जागृति समिति ने दावा किया कि 30,000 हिंदुओं कन्याओं का भी धर्मांतरण किया जा चुका है उसके बाद से यह 'लव ज़िहाद' मैसेज, वीडियो, फ़ोटो बनकर whatsapp पर घूमने लगा फिर 13 अक्टूबर 2013 में जेएनयू के प्रोफेसर मोहन राव ने किसी पत्रिका में इसके लिए लेख लिख डाला। 25 जून 2014 को विधानसभा में केरल के मुख्यमंत्री के बयान के बाद यह राजनीतिक रूप से तो थम गया जिसमें उन्होंने 'लव ज़िहाद' का कोई भी सबूत नहीं मिला अस्तित्व ही नहीं यही कहा था पर उसी साल 2014 में ही यह अचानक से उ.प्र पहुँच गया वहाँ योगी आदित्यनाथ ने सर्वप्रथम 'लव ज़िहाद कानून' की आवश्यकता पर आवाज़ ऊँची की हालांकि उस समय पार्टी आलाकमान राजनाथ सिंह को इस लव ज़िहाद की जानकारी तो नहीं थी अब आया 2016 जब लव ज़िहाद का सबसे प्रचलित मामला केरल की हादिया केस आया अखिला जन्म से हिन्दू लड़की थी इसने होमेओपेथी में डिग्री हासिल कर डॉक्टर थी जिसने बाद में शफ़ीन से प्रेम कर शादी की फिर धर्मांतरण भी किया और नाम हादिया रखा इसके परिजनों का आरोप था कि अखिला का जबरजस्ती धर्मांतरण हुआ है केरल में जाँच चली NIA तक इसमें लगा दी गयी पर लव ज़िहाद वाले मसाले न हाथ आये तभी 2017 में केरल हाईकोर्ट ने शादी को रदद् कर हादिया की कस्टडी उसके अभिवावकों को दे दी हादिया के पति शफ़ीन जहां ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई अन्तः फैसला हुआ कि जबरदस्ती धर्मांतरण का आरोप पूरी तरह गलत है और शादी को पुनः वैध करार दिया और केरल हाइकोर्ट को फ़टकार भी लगाई। फिर अभी हाल ही में उ.प्र के बिजनौर में 14 दिसंबर 2020 में बाइक में एक बर्थडे पार्टी से घर वापस बैठकर जाते एक जोड़े को कुछ लोगों द्वारा रोका गया और पूछताछ की गई पूछताछ में पता चला की युवक मुस्लिम है और लड़की दलित और वो दोनों दोस्त हैं लेकिन फिर क्या था युवक को पीटा गया फिर पुलिस थाने भेज दिया गया जहाँ युवक पर गैरकानूनी धर्मान्तरण, अपहरण के अलावा पोस्को भी लगा दिया यह एक अकेला मामला नहीं है 1 महीने में ही 14 केस हो गए 49 लोगों क़ैद हुई जिसमें सिर्फ 2 केस में ही शिकायत पीड़िता थी।
                     अगर कोई सिर्फ़ धर्मान्तरण के मकसद से शादी करता है तो यह गलत है ही धर्मातंरण मात्र के लिये किया गया निक़ाह भी मोहब्बत नहीं हो सकता फिर यह कानून सही है लेकिन इस कानून से सम्बंधी अन्य तथ्य हमें जानना भी आवश्यक है क्योंकि "लव जिहाद" जुड़े कोई डाटा न अभी तक सरकार के पास है न इसकी कोई कानूनी परिभाषा है सिर्फ कही-सुनी बातें ढेर सारी हैं, उ.प्र में तो एक एस.आई.टी भी गठित की गई थी कथित लव जिहाद के 14 मामलों की जाँच के लिए परन्तु ऐसा कुछ भी सबूत नहीं मिला वहीं दूसरी तरफ़ यह कानून संविधान के आर्टिकल 21 - Liberty और Right to privacy का भी उल्लंघन करता है, जी हाँ यह वही मौलिक अधिकार है जिसके अंतर्गत हम स्वेच्छा से देश में कहीं भी आ-जा सकते हैं स्वंत्रत विचरण करते हैं, खाते-पीते-पहनते हैं तथा अपने निजी मामले, निर्णय निजी बनाये रख पाते हैं आसान शब्दों में अगर आप किसी अन्य धर्म की लड़की से शादी कर लें तो आप सीधा हवालात जा सकते हैं। यह सरासर महिलाओं के निर्णयात्मक नीतियों पर अंकुश लगा सकता है मुझे तो उनकी चाहत, यौनिकता, स्वामित्ता को नियंत्रित करने की चाल नज़र आती है। हमारी न्याय व्यवस्था की इस मशहूर पंक्ति को तो आपने सुना ही होगा - "Innocent untill proven guilty" पर यह पंक्ति लव ज़िहाद कानून में विपरीत हो जाती है क्योंकि सबूत का बेड़ा आरोपी को उठाना होता है जबकि अन्य कानूनों में सबूत आरोप लगाने वाले को पेश करने होते हैं कि आरोपी ने इन घटनाओं को अंजाम दिया लेकिन लव ज़िहाद के आरोपी को ख़ुद ही सबूत पेश करने होते हैं कि मैंने यह आरोप नहीं किये। हालांकि इस कानून में यह भी बताया गया है कि अगर आपको धर्मान्तरण वाली शादी करनी ही है तो आपको 60 दिन पहले एक फॉर्म भरकर कलेक्टर कार्यालय में देना होगा इसके बाद जाँच होगी तब आप शादी/धर्मान्तरण कर सकते हैं, लड़के-लड़कियों की भागकर शादी करने की कहानी तो आम है अब यह विकल्प भी हाथ से गया और अब इसकी डोर भी युवक-युवतियों के परिजनों तक जाती है मतलब आप स्वयं निर्णय नहीं ले सकेंगे अगर ऐसी हिमाकत की तो आप अपराधी हो सकते हैं, हाँ यह वही न्यू इंडिया है जिसके लिए आपने वोट किया जिसे नेता विश्वगुरु भारत बताते हैं।
         इधर उ.प्र में कानून आया उधर उत्तराखंड सरकार Interfaith (गैर धर्मों में) शादियों के लिए 50,000 रु की प्रोत्साहन राशि भी दे रही है।
एक भाजपा नेत्री ने तो बयान दिया कि "यह मुस्लिम युवक युवतियों को शारीरिक रूप से संतुष्ट करने के लिए भी प्रशिक्षित होते हैं"  वाह..!!! अगर ऐसा है तो पता बतायें मेरे कुछ दोस्तों को इस प्रशिक्षण केंद्र की ज़रूरत है।
वैसे तो कानून जानने वालों ने इसे असंवैधानिक बताया तथा भाजपा की ही अलायन्स पार्टी ने भी इसका विरोध किया परन्तु यह कानून तथाकथित संख्याओं व महिला केंद्रित होने की वज़ह से यह नागरिकों के जज़्बातों से अवश्य जुड़ जाती है हो सकता है कि कुछ 2-4 मामलों में शादी धर्मान्तरण के लिए की गई हो परन्तु इसे लव ज़िहाद साजिश से जोड़ना ठीक नहीं वो भी तब जब आपके पास इससे संबंधित एक भी आंकड़े उपलब्ध न हों सोंचिये एक का नहीं मिलता और 4,500 और 30,000 के आँकड़ों के दावे कैसे हुए ज़रा आप ही विचार करें इसलिए केरल में क्रिस्चियन व हिन्दू संगठन एक हो गए वहीं उत्तर भारत में दोनों एक दूसरे के विरोध में नजर आते हैं 2014 में आगरा शहर में तो एक व्यक्ति ने चर्च के अंदर हवन तक कर डाला और क्रिस्चियन बने लोगों को वापस हिन्दू बना डाला था वैसे इन 4,500/30,000 आंकड़ों के दावों के लिए केरल व कर्नाटक ने अपनी पूरी पुलिस झोंक डाली पर जाँच के बाद यह ही पता चला कि यह आँकड़े आधारहीन थे लेकिन अपने को क्या अपन तो whatsapp university की सत्यापन विधि पर यकीन करते हैं।
वैसे तो एक ज़माना था जब 1954 में चौधरी चरण सिंह ने नेहरू से कहा था कि सभी उच्च पद पर आसीन सरकारी अधिकारी व विधायक/सांसद को अंतर-जातीय या अंतर-धार्मिक विवाह करने के लिए कानून बनाना चाहिए ताकि समाज में व्याप्त असमानता आमजनों के मन से भी छू मंतर हो जाये यह अभी सम्भव नहीं है यह तो फ़िर भी 70 साल पुरानी बात है। अगर आप व्यापक रूप से देखे तो अंतर-धार्मिक विवाह तो मुश्किल होगा ही जब अंतर-जातीय विवाहों को भी सामाजिक मान्यता नहीं मिलती अंतर-जातीय विवाह को प्रोत्साहित करने के लिए एक योजना चलायी गयी थी "डॉ.अम्बेडकर स्कीम फॉर सोशल ईनटीग्रेशन थ्रू ईटर-कास्ट मैरिजस" जिसके तहत अंतर-जातीय विवाह करने वाले सालाना 500 जोड़ों को 2.5 लाख की राशि प्रदान की जाएगी, हम में से कई लोगों ने इसका नाम तक नहीं सुना था क्या आपने इस योजना के प्रचार में किसी मंत्री,मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की तस्वीर देखी कभी या टेलीविजन में कभी इसका प्रचार देखा? कल्पना कीजिये प्रधानमंत्री की फ़ोटो के साथ इस योजना का प्रचार होता कुछ टाइटल होता 'एक देश एक जात' खैर चलिए छोड़िये इस अंतर-जातीय विवाह योजना से सन 2014-15 में 5, 2015-16 में 72, 2016-17 में 45 व 2017-18 में कुल 87 जोड़ों ने इस योजना का लाभ लिया है जी हाँ यह 1 अरब जनसंख्या वाले देश के अंतर-जातीय विवाह के आँकड़े हैं, लेकिन इसका दोष सिर्फ़ सत्ता को नहीं जाता बल्कि यह असल समस्या समाज में ही व्याप्त है अगर किसी नेता ने ऐसी योजनाओं का प्रचार कर भी दिया तो क्या आपके घर के बुजुर्ग उन्हें मत देंगे या पक्ष करेंगे? समाज की इसी अवस्था की जानकारी फ़िल्म निर्माताओं को भी है तभी हर कहानी में कपूर, खुराना, सिंघानिया, ठाकुर आदि पात्र जोड़े जाते हैं कभी कोई तथाकथित निचली जाति के सरनेम किसी फ़िल्म में मिले तो उसे नोट अवश्य कीजियेगा।

धर्मान्तरण - 
प्राचीन भारत में जब इस्लाम का उदय होने शुरू हुआ था (13वी शताब्दी) तब कई राज्यों की जनता हिन्दू राजाओं के कुशासन से पीड़ित थे कभी जाति प्रथा कभी कुछ वहीं भारत में उस समय इस्लाम नया था और जो उसमें बराबरी का वादा था स्वाभाविक रूप से गैर-ब्राम्हण समाज के लिये यह काफी आकर्षित करने वाला था, इतिहासकार अशोक कुमार पांडेय के अनुसार - 'किसी भी नए धर्मान्तरित का द्वन्द दुहरा होता है: एक तरफ़ नए धर्म के धर्मावलम्बियों के समक्ष खुद को उनसे भी अधिक समर्पित साबित करना है और दूसरी तरफ़ उस घृणा का सामना करना है जो उसके पूर्व धर्म के मतावलंबियों के मन में उसके लिए होती हैमुझे तो कई बार उन नये धर्मान्तरित लोगों में अपने पुराने धर्म के प्रति भी घृणा नज़र आती है चाहे वह कुछ क्रिश्चियन युवक, युुुुुवती हों।
                                                        ऋग्वेद श्लोक

तो आख़िर क्यों धर्मान्तरण के लिए मुख्यतः तीन धर्म - इस्लाम, ईसाइयत, बौद्ध जिम्मेदार बनें?
विश्व भर में कुछ ही धर्म शेष हैं जैसे - हिन्दू, जैन, बौद्ध और सिख जिन्होंने कभी ताक़त से धर्म परिवर्तन नहीं किया बाकी अगर हम जेसस और पैगम्बर मोहम्मद के समय को छोड़ दें तो यूरोप का भी 1,000 साल का इतिहास अंधकार से भरा है और भारत में भी सूफियों को छोड़कर इस्लाम का जिस तरह से उदय हुआ उसका इस्लाम के सिद्धांतों से कोई लेना-देना नहीं है, औरंगजेब जैसे शासकों जिन्होंने ने जबरजस्ती धर्मान्तरण कार्यक्रम चलाया तो उसी के विरोध में गुरु तेग बहादुर व महामति दास, सतीदास व दयाला जी जैसे वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी वहीं ब्रिटिशकाल में ईसाइयत के फ़ैलाव के रोकथाम हेतु आर्य समाज द्वारा "शुद्ध आंदोलन" कार्यक्रम चलाये गए पर भारत में व्याप्त जातिप्रथा, छुआछूत, असमानता के कारण शुद्ध आंदोलन सफ़ल न हो सका वही हाल अभी के "घर वापसी" का भी है।
       संख्या बल शक्ति के रूप में उभरता है तभी शायद अपने धर्म मार्ग पर आकर्षित करने का यह रिवाज़ प्राचीन है और फ़िर यह राजनीतिक संबल भी प्रदान करता है लेकिन फिर भी संख्या बल पर सिर्फ़ पारसियों ने कभी ध्यान नहीं दिया।


पाठक ऊपर पढ़ चुके हैं कि किस तरह इसाई व हिन्दू संगठनों ने युवतियों के धर्मान्तरण के आँकड़ों के दावे किये पर अभी हाल में क्या स्थिति यह जानना भी आवश्यक है -
वैसे तो सरकार अंतर-धार्मिक विवाह पर कोई सर्वे नहीं करती पर International Institute For Population Science ने 2013 में अंतर-धार्मिक विवाह पर एक पत्र प्रकाशित किया जिसमें Indian Human Development Survey Data 2005 के अनुसार 41,554 परिवारों पर सर्वे किया जिसमें पता चला कि 2.21 फीसदी महिलाओं ने अंतर-धार्मिक विवाह किया जिनकी उम्र 15-49 के बीच की थी। 
                           केंद्रीय गृहराज्य मंत्री किशन रेड्डी जी ने फरवरी 2020 में ही बताया था कि "लव जिहाद" शब्द किसी कानून में नहीं है न ही परिभाषा है तब फ़िर क्यों आखिर महिला आयोग की चेयरपर्सन को महाराष्ट्र के राज्यपाल के साथ मिलकर लव ज़िहाद के बढ़ते मामलों पर चर्चा की थी फिर एक आर.टी.आई के जवाब में आयोग ने यह भी कहा था कि उनके पास कोई भी ऐसा मामला या आंकड़ा फ़िलहाल नहीं है, बाबा राम रहीम व हनिप्रीत का खुलासा करने वाली हिम्मती युवती के साथ भी कोई आयोग नज़र नहीं आता लेक़िन लव ज़िहाद की चर्चा पर यह अवश्य नज़र आता है। वैसे अब आपके दिमाग़ में यह सवाल आ रहा होगा कि एक ऐसा कानून लाया ही क्यों गया जब सरकार के पास इससे सम्बंधित कोई आकंड़े ही नहीं है यह भी आना चाहिए कि क्या राज्य सरकार ऐसा कर सकती हैं? तो हाँ राज्य सरकार ऐसा संविधान की सातवीं अनुसूची की एंट्री पाँच के तहत कानून बना सकते हैं। भले यह कानून हमारे संविधान के आर्टिकल 25 - फ्रीडम ऑफ रिलिजन को छीनने की कोशिश हो। कई लोगों ने तो इसे नाज़ी के Anti-Miscegenation कानून से भी की है।
             एक ज़माना था जब किशोर कुमार व मधुबाला, शर्मिला टैगोर व टाइगर पटौदी, रितिक रोशन व सुजैन खान को उनके रिश्ते की वज़ह से जानते थे न कि धर्म की वज़ह से वहीं अभी सैफ़ व करीना को तो लव ज़िहाद का प्राइम प्रचारक बना दिया गया है अभी हाल के ही तनिष्क ज्वैलर्स का अंतर-धार्मिक विवाह का प्रचार तो आपको याद होगा ही जमकर बवाल मचा था, लेकिन पता नहीं क्यों इन फ़िल्म वालों को भी मुस्लिम लड़की हिन्दू लड़के की जोड़ी पसंद क्यों नहीं आती। 
        मेरा अपना मानना है कि यह अंतर जातीय या धार्मिक संबंध न बनाना हमारे बुजुर्गों की कठोर सत्ता या अधिकार पाने का एक तरीका है। अगर आपको धर्म के बारे में जानना है तो वेरियर एल्विन को जानें जो कि एक ईसाई मिशनरी थे पर वह भारत में आये महात्मा गाँधी से मिले हिन्दू धर्म अपनाया और जनजाति जीवन को समझा फ़िर पूरी जिंदगी जनजातियों के लिए ही काम किया कई किताबें भी लिखीं।
अब उ.प्र के अलावा म.प्र, हिमांचल में भी यह कानून लागू हो चुका है जबकि म.प्र में तो 1968 से ही ऐसा कानून पहले से ही है। आखिर हमें समझना होगा कि 122 भाषाओं 1,599 बोलियों व 3,000 जातियों, 25,000 उप-जातियों वाले देश को किसी भी एक विशेष धर्म या जाति में बाँध कर रखना असंभव है मैं पहले भी कह चुका हूँ अपने जाति, धर्म/मज़हब का राजनीतिक उपयोग मत होने दीजिए कम से कम मतदान करते समय यह बात अवश्य ध्यान रखें।





धन्यवाद।










संदर्भ -
अन्य पत्रिकाओं में विभिन्न विशेषज्ञों के लेख

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