आरक्षण - वरदान या अभिशाप?
मैं जानता हूँ मेरे इस लेख के शीर्षक से किसी को आपत्ति हो सकती है पर सम्भव है कि किसी वर्ग को शब्द "अभिशाप" या किसी वर्ग को शब्द "वरदान" से भी आपत्ति हो सकती है क्योंकि यह बहस है ही इतनी असीमित की इसमें घण्टों बहस करने पर भी हम किसी एक गन्तव्य या निर्णय पर नहीं पहुंचेंगे कम से कम मैं तो नहीं ही पहुँचा, वैसे इसका चर्चा का विषय कोई आज से विशाल नहीं बल्कि यह तो अपने निर्माण के वक़्त और उसके भी पहले था, तो आइए आज हम देश के सबसे प्रसिद्ध बहसों में से एक पर चर्चा करते हैं सिर्फ़ तथ्य देखने की ही कोशिश करते हैं।
आरक्षण पर चर्चा अधूरी रह जायेगी अगर हम जातिवाद, छुआ-छूत, भेदभाव आदि विषयों पर नज़र न घुमाएं सबसे पहले जाति के वर्गीकरण का उल्लेख मिलता है तो वह है - ऋग्वेद।
मेरा आपसे निवेदन है कि इस लेख को ज़रा रुककर पढ़ें पर पूरा पढ़ें मैंने इस लेख में आरक्षण के परिचय,इतिहास,असर सभी का निष्पक्ष समावेश करने की कोशिश की
ऋग्वेद के अनुसार -
ऋग्वेद को सनातन धर्म का सबसे पुराना ग्रंथ माना गया है जैसा कि इसमें उल्लेख है इस पृथ्वी पर जो लोग पहले से रह रहे थे उन्होंने एक बेहतर सभ्यता एवं नए जीवन के लिए स्वयं को नष्ट कर लिया लेकिन उनके शरीर नष्ट होने से शरीर के सर वाले हिस्से से बने ब्राह्मण, भुजाओं से निर्मित हुए क्षत्रिय, जाँघ से जन्म हुआ वैश्य का और उनके पैरों से बने शुद्र लोग।
आप इन चारों जातियों के बंधे हुए कार्य तो जानते ही होंगे लेकिन इनके अलावा एक और जाति थी दलित यह ऋग्वेद के वर्ण विभाजन में अनुपस्थित थे इसलिए इन्हें उनकी अपनी सुविधानुसार 'अवर्ण' भी कहा गया इनके लिए सफ़ाई के कार्य पक्के किये गए ताकि समाजिक व्यवस्था बनी रहे और मानव आधुनिकता को प्राप्त करता रहे लेकिन तब शायद समाज यह भूल चुका था कि वह सभ्यता के नाम पर अपनी सुविधा को आड़े रख एक ऐसे कुरूप समाज का निर्माण कर रहा है जिसको सुंदर बनाते बनाते आने वाली पीढ़ियों की क़मर टूट जाएगी और यह हुआ भी यही हर बार जातिवाद की बात करके हम उस खाई को निरन्तर गहराते हैं ज़रूरत है तो बस आपको खबरों से सूचित रहने की लेकिन इसकी उम्मीद आप कम से कम TV Media तो छोड़ ही दें क्योंकि वह अभी सुशांत आत्महत्या कांड से सुशांत को ही न्याय दिला कर आराम कर रहा है स्टूडियो में। ख़ैर विषय पर लौटते हुए आपको कुछ और तथ्य जानने आवश्यक हैं जैसे कि पहले एक ब्राह्मण महिला एक क्षत्रिय या वैश्य जाति में इच्छानुसार विवाह कर सकती थी और क्षत्रिय और वैश्य जाति की महिला और पुरुष भी लेकिन उसके लिए शुद्र या दलितों में विवाह करना असंभव था परन्तु स्थितियां बदलती गयीं हालांकि कुछ विद्वानों का यह भी मानना था कि आपकी जाति आपका पेशा नहीं निर्धारित करती, बल्कि आपका पेशा आपकी जाति निर्धारित कर सकता है वैसे जाति का एकाधिकार हर समाज में आपको मिल जाएगा चाहे वह दलित ही क्यों न हों चाहे पासी हों या जाटव, सतनामी हों या रामनामी समाज इनमें भी आपस भी शादियाँ तो दूर छुआ-छूत भी उपस्थित होता है।
वर्ण व्यवस्था का आधुनिक संक्रमण -
यह वर्ण व्यवस्था तो पुरातन काल में थी न तो यह नए परिवेश अंग्रेजों के आधुनिक काल में यह व्यवस्था कैसे सफ़र कर पहुँच गयी कभी तो आपने भी सोचा होगा, वैसे यह स्वयं सफ़र कर पहुँची नहीं बल्कि इसे लाया गया या यूं कहें मँगाया गया।
1. सर्वप्रथम सन 1772 में वारेन स्टिंग्स ने "हिन्दू और मुस्लिम कानून" को शुरू करने के लिए 11 ब्राह्मणों का चयन किया ताकि वह भारत को सामाजिक रूप से समझ सकें उन्हें तो बस सरल तरीका चाहिए था क्योंकि भारतीय जाति-समाज उनके लिए बहुत जटिल था और इसी 11 लोगों के समूह ने ब्राह्मणों को सर्वोच्चय बताया जैसे शिक्षा-दीक्षा का अधिकार यह पहले भी होता था लेकिन इस समूह ने वैदिक कानून को वृहद रूप दे दिया उस वक़्त तक सभी इन व्यवस्थाओं को नहीं मानते थे पर अब जातिवाद और भेदभाव का नया संक्रमण काल था। इसे ही डॉ.अम्बेडकर "ब्राह्मणवाद" कहा करते थे पर उनके इस शब्द से वह किसी जाति के खिलाफ़ नहीं थे वह उस विचारधारा के खिलाफ़ थे जो कि समाज के कमज़ोर तबके को और दीन-हीन, दरिद्र बनाने में जुटी हुई थी।
2. जेम्स प्रिन्सेप जो कि सन 1834 में जनगणना कर रहे थे उन्होंने पाया था कि बनारस के ही ब्राम्हणों में ही 107 से अधिक अलग-अलग जातियां थी।
3. सन 1872 हेनरी वॉरफील्ड जो कि अधिकारी थे Statics & Commerce Department of India के उन्होंने ने माना कि सर्वाधिक चर्चित चार वर्णों वाली प्रणाली ही सबसे उचित है।
4. लेकिन 1871 के मद्रास जनगणना के लिए जिम्मेदार डब्ल्यू.बी कार्निस का मानना था कि इतिहास के अनुसार भारत में कभी चार वर्ण प्रणाली कार्यरत थी ही नहीं बल्कि और कई वर्णों में विभाजित थे।
यह अंग्रेजों के विचार थे कार्य थे अपना शासन था लेकिन भारतीय समाजवादी एम.एन श्रीनिवास का मानना था कि अंग्रेजों के आने के बाद समाजिक विदुषता और फैली, पहले लोग आपस में घुल-मिल सकते थे पर अंग्रेजों के आगमन से ही अब भीड़ भी सम्भव न थी इसीलिए हम खोजते हैं तो पाते हैं कि दलितों से छुआ-छूत के बाद उनकी परछाई उनकी आवाज़ तक पड़ना अशुभ माना जाने लगा देश के एक बड़े वर्ग द्वारा, समय के साथ संक्रमण बढ़ता गया।
5. सन 1910 में वॉइसराय लॉर्ड हार्डिंगे ने मद्रास लोकसेवा की नौकरियों के लिए एक सामान्य प्रतियोगी परीक्षा अंग्रेजी में रखी, आज हम-आप जैसों को अँग्रेजी की परीक्षाओं में पसीने आ जाते हैं साहब यह तो फ़िर भी एक सदी पुरानी बात है ख़ैर परिणाम आया और मद्रास की कुल जनसंख्या की 3% वाली ब्राम्हण जाति कुल पदों की 80% से अधिक पद पर प्रदर्शित हुए वैसे यह पहली बार नहीं था कि ब्राम्हण जाति के विद्यार्थी शैक्षणिक संस्थानों पर अग्र हो बल्कि 1891-92 में कश्मीर के शैक्षणिक संस्थानों में पंजीकृत 1585 विद्यार्थियों में 1327 विद्यार्थी ब्राम्हण जाति के थे और कश्मीर घाटी की जनसंख्या में इनकी भागीदारी लगभग 7% थी। यह आँकङे किसी को भी सोचने पर मजबूर कर सकते हैं कि यह कौन सा आरक्षण था जो कि सदियों से चला आ रहा था। वर्षों से शिक्षण व बौद्धिक संक्रियाओं में सलंग्न इस लोगों को इसका ऐसे ही फ़ायदा मिलता रहा। इतिहास में आप झांक कर देखेंगे तो पाएंगे कि ब्राह्मणों की शिक्षा-दीक्षा व पालन-पोषण ऐसा किया ही जाता था कि वे शासकीय पदों पर बैठें।
असंतोष उभरना लाज़मी था और जब भी असंतोष उपजता है इसकी शुरुआत हमेशा पढ़े-लिखे वर्ग से होती थी अब भी होती है पर ऐसे लोगों को अब 'देशद्रोही, पाकिस्तानी-खलिस्तानी, हिन्दू-विरोधी, अर्बन नक्सल, खान मार्केट गैंग, अवार्ड वापसी गैंग, कांग्रेसी और टुकड़े-टुकड़े गैंग' जैसे प्रोपगैंडा वाले शब्दों से न सिर्फ़ सत्ताधीन सरकार के समर्थक बल्कि पत्रकार के वेश में एक गुंडा जो कि कोहनी तक अपनी शर्ट की आस्तीन को मोड़ कर चुनौती देता नज़र आता है, ख़ैर फिर से छोड़िए मैं फिर से विषय से भटक गया असन्तोष को आवाज़ कई लोगों ने दी इसका प्रतिनिधित्व मुख्यतः तीन लोगों ने किया -
देश मे सर्वप्रथम आरक्षण की शुरूआत शाहू जी महाराज जो कि कोल्हापुर के राजा थे उन्होंने इसकी शुरुआत की थी,
ज्योतिराव फुले ने सन 1873 में सत्य सोधक समाज की स्थापना की थी और यह वेदों के खिलाफ़ थे
पर 20वी सदी में सबसे लोकप्रिय नाम आता है वह है डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर यह खुद समाज में व्याप्त भेदभाव के बीच में से उठकर शिक्षा के लिए विदेश तक गए थे इनके लग्न, बौद्धिकता, कुशलता, मेहनत, चिंतन का लोहा उस समय महात्मा गाँधी समेत देश के कई बड़े नेता मानते थे।
अंबडेकर और आरक्षण -
सन 1914 में मद्रास लेजेस्लेटिवे कॉउंसिल ने मद्रास यूनिवर्सिटी से पास छात्रों का विवरण माँगा जिसमें 650 छात्रों में से 452 ब्राम्हण जाति के और 12 गैर-ब्राम्हण और 74 अन्य पिछड़ी जातियों से थे।
सन 1918 में मैसूर के महाराजा को एक याचिका दी गयी दलितों की तरफ़ से ही जिसमें महाराज ने मिलर कमेटी की स्थापना कर दलितों के प्रतिनिधित्व को नौकरियों में बढ़ाने के लिए कहा।
लेकिन 1918 में ब्रिटिश सरकार प्रथम विश्वयुद्ध में व्यस्त थी सरकार भारतीयों से चाहती थी कि वह भी विश्वयुद्ध में ब्रिटिशों का साथ दे इसलिए उसने भारतीयों की लंबी मांग Self Governing Institute को मान लिया अपने स्वार्थ के लिए इसे ही Montague - Chelmsford Reform नाम से जाना गया और Govt of India Act 1919 बनाया गया और साइड बाई साइड अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व की माँग चल रही थी तो साइमन कमीशन का गठन किया गया जिनसे दलितों ने Separate Electorate की माँग की इसमें सिर्फ़ दलित ही मतदान कर सकते थे पर कमीशन भी इसके फेवर में नहीं थी।
सन 1923 में सरकार ने निश्चित किया कि उन स्कूलों को अनुमति नहीं दी जाएगी जो एड्मिसन में जाति आधारित भेदभाव करेंगे, तभी डॉ. अम्बेडकर ने Legislative, Special Education, Government Posts पर दलितों के लिए आरक्षण पर सर्वप्रथम माँग की और माँग चलती रही ब्रिटिश हुकूमत ने नवम्बर 1930 में राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस आयोजित की इसमें काँग्रेस ने अपनी भागीदारी नहीं निभायी क्योंकि काँग्रेस उस समय Civil Disobedience Campaign पर थी जिसमें आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाले वीरों को गंभीर कानून से बचाया जाना था आखिरकार कॉन्फ्रेंस फेल हो गयी।
डॉ.अम्बेडकर ने 1930 में नागपुर में दलितों की एक सभा की अंततः सरकार ने उनकी Separate Electorate की माँग स्वीकार 1932 में कर ही लेकिन महात्मा गाँधी इसके सख्त खिलाफ़ थे उन्हें लगता था कि यह ब्रिटिशर्स की चाल है जिसके तहत हिन्दू और दलित सदा के लिए अलग हो जाएंगे और जातिवाद बढ़ेगा अंबडेकर भी ज़िद्दी स्वभाव के थे उन्होंने मना कर दिया महात्मा गाँधी जी ने एक भूख हड़ताल पुणे जेल में ही शुरू कर दी अंबेडकर आये और उनकी बात समझकर उनसे रजामंद हुए इसे ही हम "पूना पैक्ट" के नाम से जानते हैं Legislative में जहाँ हरिजनों को Separate Electorate के नाम पर जहाँ 71 सीट मिल रही थी अब दलितों के पास 147 सीटें थी वहीं अभी तक नौकरियों व शिक्षाओं में आरक्षण का प्रवधान नहीं था पर संविधान बनने के साथ ही जाति आधारित आरक्षण मिलने की कयास लगाई जा रही थी और अम्बेडकर संविधान की ड्राफ्टिंग कमेटी के हेड भी थे तो यह तो अनिवार्य ही था हालांकि संविधान में आरक्षण को लेकर सरदार पटेल समेत कई कई सदस्य इसके खिलाफ थे पर महात्मा गाँधी, नेहरू और अम्बेडकर समेत कई सदस्य इसके पक्ष में एक बार तो विरोधाभास तो यहाँ तक पहुँच गया कि अम्बेडकर अपने पदों से इस्तीफे की बात तक कर दी पर ऐसे गुणी, बौद्धिक इंसान को कौन जाने दे सकता है वो भी तब जब देश में ऐसा दूसरा कोई न हो...
आखिरकार संविधान में धारा 15 और 16 के तहत अनुसूचित जाति को 15% व जनजाति को 7.5% आरक्षण का प्रवधान शिक्षा और सरकारी नौकरी के लिये भी सन्निहित किया गया साथ ही राज्यों को आरक्षण बढ़ाने की भी स्वंत्रता दी गयी एक बात और स्पष्ट करना जरूरी होगा कि आरक्षण संविधान में Affirmative actions के तहत आता है आरक्षण का प्रवधान अन्य किसी देश में तो नहीं है लेकिन कई देशों में Affirmative actions अलग-अलग रूप में दिए गए हैं। फिर बाद में सन 1993 में मंडल कमीशन में छात्रों के जबरदस्त आंदोलन द्वारा अन्य पिछड़ा वर्ग को 27% आरक्षण दिया गया अभी 2019 में सामान्य वर्ग के आर्थिक कमज़ोरों को भी 10% आरक्षण की सौगात मिली।
डॉ. अंबडेकर अपने बचपन से कई चुनौतियों से उभरकर आये थे वह समाज में व्याप्त जातिवाद को मात्र एक सरकारी नौकरी में बैठकर आनंद लेने वालों में से नहीं थे उन्होंने दलितों को सबसे पहले तालाब,कुएं से पानी पीने का अधिकार दिलाया उसके बाद दलित महिलाओं को साड़ी नीचे तक पहनने का अधिकार दिलाया। (महिलाओं को साड़ी घुटने के ज़रा सा नीचे तक ही पहनने का अधिकार था)
छुआछूत-भेदभाव और विश्वगुरु भारत -
आपको लगता होगा छुआछूत भेदभाव अब कोई नहीं मानता लेकिन आप गलत हैं अगर आप शहरों में बैठकर या सभ्य समाज या पक्की सड़कों वाली कॉलोनियों में रहते हैं, संभ्रांत परिवार वाले भी इस सोंच से दूर ही रहें क्योंकि आपने अभी तक गाँव में कदम नहीं रखा है या असभ्यता से पाला नहीं पड़ा है।
हाथरस (उ.प्र) वाले कांड पर Quint ने जातिगत भेदभाव पर एक ग्राउंड रिपोर्ट की थी आपको यह देखना ही चाहिए
SARI (Social Attitudes Research of India) ने जातिगत भेदभाव पर एक फ़ोन सर्वे दिल्ली, उ.प्र, राजस्थान, मुम्बई में किया था जिसके अनुसार दिल्ली मात्र में ही 39% गैर-दलित महिलाओं ने माना कि उनके घरों में अस्पृश्यता आज भी मानी जाती है वहीं 29% महिलाओं का स्वीकारना था कि उनके द्वारा भी अस्पृश्यता मानी जाती है, राजस्थान में 60% लोग अंतर-जातीय विवाह के खिलाफ़ हैं।
आरक्षण का प्रभाव -
आरक्षण का इतिहास और आरक्षण के बारे में तो आप काफ़ी जान चुके हैं पर आरक्षण के प्रभाव के बारे में भी जानकारी होनी आवश्यक है क्योंकि इससे क्या असर पड़ा है उनकी ज़िंदगी में क्या प्रतिनिधित्व किया है उन्होंने सरकारी नौकरियों, विधायी और शिक्षा पर आइए समझने की कोशिश करते हैं इसे समझने के लिए रिसर्च पेपर्स का सहारा लेंगे जो एमिनेंट स्कॉलर्स के द्वारा लिखे गए हैं
शुरुआत करते हैं शिक्षा से जो कि किसी भी इंसान की शुरुआती सुविधा होनी चाहिए, तो क्या आरक्षण से अनुसूचित जाति व जनजातियों का प्रतिनिधित्व बढ़ा है तो हाँ यह बढ़ा तो है आप देख सकते हैं ग्राफ के जरिये
लेकिन अनुसूचित जनजातियाँ (ST) अभी तक अपने शिक्षण आरक्षण को पूर्णतः प्राप्त नहीं कर पाए हैं
एक प्रश्न यह भी उठना चाहिए कि शिक्षण में यह जो बदलाव आया है यह आरक्षण मात्र से ही आया है या भारत की आर्थिक-समाजिक प्रगति से आया है? रिसर्चर्स को इस बात का कोई सबूत नहीं मिला कि यह उछाल आरक्षण से ही आयी है या देश की प्रगति से
और पंचायत चुनावों से यह पता चला कि अनुसूचित जनजातियों की आर्थिक दशा में जरूर सुधार हुए हैं पर अनुसूचित जातियों में यह अनुपस्थित था।
दोनों ग्रुप्स से वेतनभोगी कर्मियों की संख्या में 5% का इजाफ़ा हुआ है।
अन्य पिछड़ावर्ग (OBC) को आरक्षण मिलने से यह ग्रुप भी 0.8 साल अधिक शिक्षा में निवेश करने लगा है
लेकिन यह बहस भी अपनी महत्वपूर्ण जगह बनाती है कि आरक्षण मिल जाने से या नौकरी मिल जाने से उनकी दशा में सुधार हुआ है तभी जब एक अनुसूचित जाति या जनजाति के व्यक्ति को किसी सरकारी पद पर बैठे पाते हैं तब उसके सामने तो सम्मान किया जाता है पर उसके केबिन से निकलते-निकलते जातिसूचक गाली भी दे दी जाती है इन्हीं विचारों का असर हम पाते हैं कि एक दलित सरपंच के चुने जाने पर भी गाँव के लोगों से उसका बहिष्कार किया तमिलनाडु के एक दलित महिला सरपंच को ज़मीन पर बैठने पर मजबूर किया।
जब भेदभाव जातिगत था तो आरक्षण कैसे आर्थिक हो जाएगा?
आरक्षण - तथ्य बनाम आलोचना -
जिन्हें आरक्षण नहीं प्राप्त होता उन्हें इससे हमेशा शिकायत होती है और क्यों न भी हो.. जब संविधान निर्माण हो रहा था तब भी सरदार पटेल समेत कई नेताओं का यही मानना था कि कुछ सालों बाद हर कोई आरक्षण की माँग करेगा इसीलिए आरक्षण को आरंभ के 10 सालों के लिए जारी किया गया था।
1. क्रीमी लेयर सीमित आरक्षण -
लोग हमेशा कहते हैं कि जातियों में एक स्तर तक ही आरक्षण का फ़ायदा मिलता है और असल में लोग ही नहीं बल्कि इस लेख के रिसर्च करने से पहले तक मेरा भी यही सोचना था पर मैं गलत साबित हुआ क्योंकि एक रिसर्चर ने यह साबित किया कि उसे कोई क्रीमी लेयर नहीं मिली।
2. आरक्षित वर्गों से कार्य प्रभाविता -
यह एक बहुत सामान्य अलोचना है कि आरक्षित वर्गों को मेरिट के बजाय आरक्षण से नौकरियाँ मिलने पर उस पद की कार्य प्रभाविता में नकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं। 1980-2002 तक इंडियन रेलवेस कि भर्तियों में आरक्षण होने से क्या कार्यक्षमता प्रभावित हुए इसकी एक केस स्टडी की गई पर यह आलोचना भी साबित नहीं हो पाई
3. शिक्षण संबंधी आलोचना -
संस्थानों में पड़ रहे छात्रों को भी यह लगता है कि आरक्षित कोटा से आये छात्र सिलेबस या विषयों से अनुकूल नहीं हो पाएंगे लेकिन 200 अभियांत्रिकी महाविद्यालयों में स्टडी से पता चला कि यह आलोचना भी गलत है।
वैसे यह आलोचक छात्र-छात्रा अब उत्तीर्ण-अनुत्तीर्ण छात्रों का अनुपात दिखा कर जातियों को कमजोर बताने की कोशिश कर सकते हैं सम्हल कर रहें आप भी इनसे बस निंदक नियरे राखिये।
डॉ. अम्बेडकर ने अपनी किताब 'Annihilation Of Caste' में कहा था कि सिर्फ़ आरक्षण से जातिप्रथा नहीं जाएगी। अब समझना हम युवाओं को ही है क्योंकि भविष्य हम है बल्कि भाग्य विधाता इस देश के हम ही हैं तो क्या इन भेदभाव से उभर कर क्या हमें एक नए समाज का निर्माण नहीं करना चाहिए जब देश का एक हिस्सा काफी पिछड़ा रह जायेगा या एक हिस्सा बहुत विकसित हो जाएगा तो क्या यह देश सुंदर बचेगा.. जाति-धर्म-सम्प्रदाय की लड़ाई में न मिले रहकर आगे बढ़ाते हैं या तो आप ही किसी ऐसे विकसित देश का नाम बता दीजिए जिसमें सिर्फ़ एक ही जाति-धर्म अकेले प्रभावी हों वैसे एक बात तो आरक्षित वर्गों को भी समझने की आवश्यकता है कि सरकारी नौकरियाँ सिर्फ़ सुरक्षित रोजगार नहीं बल्कि सत्ता में भागीदारी और शक्ति-संरचना की भी हिस्सेदार होती हैं इसलिए सरकारी कर्मचारी व अधिकारी सत्ता की नीतियों को लागू करने वाले ही नहीं होते बल्कि उसके निर्माता व नियन्ता भी होते हैं आप उस वर्ग को न भूलें जो ऐतीहासिक संक्रियाओं में वंचित रह गए थे सशक्तिकृत भी करें।
धन्यवाद
सन्दर्भ -
Comments
Post a Comment