कृषि कानून - संशोधन या बदलाव ?

                                           आपने कभी किसान के बारे में सोंचा है? जरूर सोंचा होगा कल्पना की होगी आपके मन में भी किसान शब्द आते ही बेबस, परेशान, गरीब, निराशावादी आदि के संयोग से चित्र मन में ही स्व-निर्मित होता होगा । किसान भी खाता है पीता है खरीददारी करता है वह भी आपकी तरह चालबाज़ चाइना को बॉयकॉट करने की कोशिश करता है और पाकिस्तान के बारे में भी राय रखता है, उसके लिए भी स्वयं के मुद्दे से ऊपर राष्ट्रीय मुद्दे होते हैं तभी चुनाव करता है। इसलिए भारत को अपना दृष्टिकोण कृषि समुदाय के लिये बदलने की ज़रूरत है क्योंकि वह भी ख़ुशहाल हो सकता है, वैसे भी एक बार अगर इंसान दया का पात्र हो जाता है तो वह अंततः मज़बूर भी हो जाता है।

5 जून 2020 को राष्ट्रपति द्वारा कृषि कानून के अध्यादेश आये और 27 सितंबर 2020 को राज्यसभा से पारित हुए आईये पहले उन तीन क़ानूनो के मुख्य बिंदुओ को जान लेते हैं जिसकी वज़ह से किसान सड़क पर प्रदर्शित हैं  

1. आवश्यक वस्तु (संशोधन) कानून 2020 -
                           
                                        यह कानून सर्वप्रथम सन 1955 में लागू हुआ था। इसके अंतर्गत कुछ आवश्यक वस्तुओं (अनाज,दाल,तिलहन,खाद्य तेल,आलू,प्याज़) की कीमत, उत्पादन, पूर्ति का नियंत्रण कुछ हद तक सरकार करेगी ताकि इनकी क़ीमत नियंत्रित रहे व भारत के आमजन भी इसका उपयोग मुश्किल हालातों में भी कर सके।
          पर इस संशोधन में सरकार ने यह बताया है कि आवश्यक वस्तुओं पर अब सरकार नियंत्रण सिर्फ़ असामान्य परिस्थितियों (युद्ध,आकाल,क़ीमत अनिश्चितता) पर ही करेगी। 
     क्या आपको यह सही लगता है? यह वही कानून है जिसके तहत कालाबाजारी अपराध थी हम सभी को पता है सामान्य स्थितियों की आवृत्ति असामान्य परिस्थितियों से अधिक ही होती है अगर सरकार सिर्फ़ विपरीत हालातों में नियंत्रित करेगी तो सामान्य हालात वाले व्यापारी वस्तुओं को जमा करना शुरु कर देंगे जिससे किसानों की फ़सल तो सस्ते दामों पर खरीद कर जमाखोरी कर उसे आमजन के लिए महँगा बना दिया जाएगा आपको अभी पिछले सालों के प्याज़,दालों के बढ़े दाम तो याद ही होंगें, माल की कमी कभी नहीं होती यह हमेशा उपलब्ध होता है लेक़िन जमाखोरी कर इसे महँगा किया जाता है फ़िर मोटी कमाई की जाती है । इस नए संशोधन से व्यापारियों का साम्राज्य खेतों से लेकर व्यापार तक फैल जाएगा और इस फ़ैलाव का खिंचाव हमारे घरों पर भी महसूस होगा, न किसान को सही क़ीमत न हमको सही कीमत।
2. कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) कानून - 
                           जब देश आज़ाद हुआ तब के किसान धन्नासेठों और सूदखोरों के भारी कर्ज़ में डूबे रहते थे उनकी फ़सल खेतों में तैयार होती नहीं कि जमींदार, व्यवसायी आकर सारी फ़सल सस्ते दामों में उठाकर ले जाते और किसान के फायदे और लागत तो दूर सीधे लूट मची थी इस लूट को ही ख़त्म करने के लिए सरकार ने सन 1965 में APMC Act (Agriculture Product Marketing Committee) बनाया एवं यह हरित क्रांति के दौर में बना क़ानून था और हरित क्रांति इस देश के लिए कितनी महत्वपूर्ण थी आप जानते ही होंगे रेगुलेटेड मंडियां स्थापित की गई जिसमें किसान अपनी फ़सल को लाते और समर्थन मूल्य पर भी उचित दाम पाते व्यापारियों की मंडी में खरीद हेतु लाइसेंस अनिवार्य होता और 6% टैक्स भी देना होता बदले में मंडी लाइसेंसधारी व्यापारियों को सर्विस देती।
            अब नए कानून के बाद किसान अपनी फ़सल को बेचने हेतु मंडी तक ही बंधित नहीं रहेगा वह कहीं भी अपनी फ़सल का विपणन कर सकता है और फ़सल खरीदने वाले व्यापारियों को किसी सरकारी लाइसेंस की ज़रूरत नहीं पड़ेगी वह मात्र पैन कार्ड से खरीद सकेंगे सुनने में यह कितना सुविधाजनक लगता है न..
                     मण्डियों में बेचने की अनिवार्यता ख़त्म होने का मतलब यह नहीं कि किसान अब आज़ाद है क्योंकि किसान तो पहले से ही आज़ाद है अपनी फ़सल बेचने के लिए वह अपनी फ़सल कहीं भी बेच सकता था पहले भी मंडियों के अलावा प्राइवेट मण्डियों से होगा यह कि अंत मे मंडियां ख़त्म हो जाएंगी और आंदोलित किसान की माँग यह है कि सरकार MSP को कानून बना दे फ़िर भले प्राइवेट मण्डियों को स्वीकृत करते रहे वैसे इन मण्डियों में तो किसी टैक्स की ज़रूरत तो होगी नहीं तो एक व्यापारी सरकारी मंडी पर जाकर टैक्स क्यों देगा टैक्स देना किसे पसंद है क्या आपको 18% GST देना अच्छा लगता है? और प्राइवेट मण्डियों में अगर व्यापारियों ने एक सर्व सहमति से एक राय बनाकर ख़रीदी की रकम निर्धारित कर ली तो क्या होगा आख़िर में हम उसी आज़ादी के बाद वाली समस्या पर पुनः आ खड़े होंगे और प्राइवेट मंडियां अगर दूर स्थानों पर खुली भी तो किसान के खेत से लेकर बड़े शहर की बड़ी मंडी तक फ़सल पहुंचाना आसान बात नहीं आवागमन का बोझ अलग बढ़ेगा। बिहार में सन 2006 से ही APMC Act ख़त्म कर दिया गया है मात्र 1% किसान अपनी फ़सल MSP पर बेचते हैं और कृषि मंत्री के ही अनुसार बिहार के कृषक की मासिक आय 5,000 रु. है और यह देश में सबसे कम है (2019) वैसे हरियाणा का किसान सर्वाधिक आय प्राप्त करता है लगभग 14,434 रु./माह। मंडियां अमेरिका और यूरोप में भी ख़त्म कर दी गई है और ताजा रिपोर्ट्स के अनुसार वहाँ के किसानों में भी भारी कर्ज़, आत्महत्या जैसे मामले तेज़ी से बढ़ते नज़र आये हैं तो जब यह सिस्टम बिहार, अमेरिका, यूरोप में फेल हो गया तो पूरे देश में इसे लाने का अवचित क्या है, वैसे मण्डियों में देश के कुल 6% किसान ही फ़सल बेचते हैं लेक़िन यह किसानों की संख्या पंजाब में सर्वाधिक होकर 85% पर पहुँच जाती है। सरकार ने अभी तक मंडियों के खात्मे की बात नहीं की है लेक़िन वित्त मंत्री के नवंबर 2019 के एक बयान के अनुसार उन्होंने मंडी व्यवस्था को "गई-बीती" बताया था और इसके विदा होने का समय आ गया है ऐसा बताया था सभी जानते हैं कि मंडी व्यवस्था में कमियां व्याप्त हैं जैसे लाइसेंसराज शुरू हो गया था लेकिन किसानों के लिये यह छप्पर की तरह है इसे सुधार की आवश्यकता है आप छप्पर हटाकर कहें कि आप चाँद-सितारे देखने के लिए आज़ाद हैं तो सर पर से छप्पर हटाकर सितारों वाली आज़ादी उसे नहीं चाहिए।

Neo - liberalism  यह एक फ्री मार्केट की विचारधारा है जो सरकार रहित मार्केट में विश्वास रखती यह अमेरिका में लोकप्रिय है लेकिन अगर कुछ आवश्यक वस्तुओं में सरकार का नियंत्रण नहीं होगा तो वस्तु का सभी तक पहुंचना मुश्किल हो जाएगा 


3. कृषि कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार - 
                                      
                                     इसके तहत ठेका खेती (contract farming) के क़ानून आते हैं। नए क़ानून के अनुसार अब कृषि हेेतु सभी आवश्यक तत्व जैसे - बीज, खाद,यंत्र,आदि व्यापारी ही देंगे साथ ही एक और नयी चीज जुड़ चुकी हैै जो है कि अब किसान कि उपज का मलिकाना हक किसान को ही जाता है बताईये फिर शब्द "ठेका" का तात्पर्य क्या हुआ..? और साथ ही किसान पूर्णतः स्वतंत्र होगा अपनी फसल के विपणन के लिये पर अगर व्यापारी ने फसल की गुणवत्ता का हवाला देकर उपज लेने से मन कर दिय तब क्या होगा किसान का, जैसा कि पंजाब में पहले भी हो चुका है पेप्सीको कम्पनी द्वारा उन्होने अपनी टमाटर, मिर्ची  किसानो से नही ली थी अब ऐसी परिस्थितियो में किसान के पास एक ही चारा बच जाता है कि किसान पुलिस, आदालत के पास गुहर लगाये पर आपको शायद जानकर हैरानी न हो लेकिन वह अब मात्र एसडीएम या डीएम के पास ही सुलह के लिये जा सकता है ऐसे दफ्तरों के चक्कर काटना कितना मुश्किल है अगर आपने कभी आय,जाति प्रमाण पत्र बनवाया है तो आप ज़्यादा बेहतर ही जान सकते हैं।
           और इन ठेका खेती में अक़्सर एकपक्षीय होने के आरोप हमेशा से लगते आये हैं और किसान के आंदोलित होने पर सरकार पर corporitization करने का आरोप आसानी से लग जाता है और अगर अब किसान थाने नहीं जा सकता तो सरकार इस बात की भी पूरी व्यवस्था कर चुकी है कि आपकी जेब में 10,000 रु./माह भी न आये पर कभी-कभी वह आपको 500 रु. आपके खाते में डालकर या 6,000 रु./वार्षिक किसान निधि के रूप में मात्र 14.5 करोड़ परिवारों को देकर शायद लोकप्रिय हो सकती है या हो सकता है कुछ राज्य धान,गेहूँ मुफ़्त भी देने लगे या कोई गोबर के साथ गौ-मूत्र पर प्रोत्साहन राशि देने का इंतजाम भी कर ले।
तो यह विरोध आंदोलन के कारण हैं भले TV मीडिया हमें यह न बताए वैसे भी मीडिया कोई आज की "किसान विरोधी" नहीं रही है यह पहले से ही ऐसी है। आंदोलन के लिए NH-44 सड़क पर किसान उतरे हैं और शायद सरकार भी यही चाहती है कि किसान सड़क पर ही आ जाये ताकि सस्ते श्रमिक मिल जायें तभी RBI के चैयरमैन ने एक बयान में कहा था कि "हमें लोगों को गाँव से शहर की ओर लाना है" आखिर क्यों लाना है आप ख़ुद सोचिये, जितने भी श्रमिक हैं वैसे भी वह शहरों में कहीं न कहीं "कृषि शरणार्थी" के रूप में हैं। वैसे किसान के आंदोलन भी कोई आज पहली बार नहीं हो रहे हैं।
1. सन 1988 में भारतीय किसान यूनियन ने इसमें ही महेंद्र सिंह टिकैत भी शामिल थे।
2. सितम्बर 2017 में उ.प्र और महाराष्ट्र के किसानों ने कृषि उपज के गिरते समर्थन मूल्य के लिये आंदोलन किया था।
3. मार्च 2018 में किसानों का नासिक से मुंबई तक 35,000 किसानों का मार्च तो आपको याद ही होगा।
4. उसी साल, हरियाणा में "जय किसान आंदोलन" सरसों और तिल के लिये भी आंदोलन हुआ है।
5. कपास के मुआवजा सहित अन्य कई आंदोलन हो चुके हैं आपकी तरह मुझे भी नहीं पता।
                    
                              हालांकि यह बात अलग है कि NES (National Election Survey) की एक रिपोर्ट के अनुसार किसान के वोट शेयर NDA के लिए 2014 के मुकाबले 2019 में 8% बढ़े ही हैं, मैंने आपको पहले ही बताया था कि उसके मुद्दे पर भी राष्ट्रीय मुद्दे उसके ऊपर हावी ही हैं।

हालांकि इस बात को भी कहने में कोई हर्ज़ नहीं होना चाहिए कि किसानों की यह हालत कोई आज की नहीं बल्कि 211 साल पहले यानी 1 जुलाई 1879 में किसानों पर पहली रिपोर्ट आई जो कि ए.ओ ह्यूम द्वारा तत्कालीन वायसराय लार्ड मेयो को उन्हीं के आदेश पर दी गयी थी उस रिपोर्ट के अनुसार, "भारतीय किसानों के 3,000 साल पुराने अनुभवों के बाद भी उनकी हालत पिछले 70 सालों से ठीक नहीं है" शायद ए.ओ ह्यूम को मात्र 70 सालों का ही हाल मिला होगा लेकिन यह समस्या कोई 200-300 सालों पुरानी भी नहीं बल्कि और पुरानी है इसके लिए आपको इतिहास किताबों में खोजना होगा whatsapp या facebook पर यह नहीं मिलेगा क्योंकि शासक और सेवक शब्द सिर्फ़ व्याकरण से नहीं बने बल्कि इनमें संज्ञा भी सन्निहित होती है। वैसे विषय-वस्तु पर वापस आकर आपको बताना चाहूँगा कि ए.ओ ह्यूम द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट में सुझाव भी थे लेकिन वे सुझाव न आज़तक विदेशी शासकों ने अपनाये न ही स्वदेशी सरकार ने मतलब 41 वाइसरॉय,14 प्रधानमंत्री और 17 सरकारें।
तीन मुख्य सुझाव थे -
1. कृषि अधिकारियों या कर्मियों को किसानों के साथ कम से कम 10 घण्टे का समय 10 सालों के लिए देना होगा और परस्पर एक-दूसरे से सीखना चाहिए और कृषि महाविद्यालय शुरू होने चाहिए।
2. किसानों को अन्य क्षेत्र जैसे - कला, विज्ञान और उद्योग से जोड़ना चाहिए उनका प्रदर्शन इंग्लैंड, अमेरिका जैसे देशों में हो।
3. इस देश में कृषि संस्थानों की ज़रूरत महाविद्यालय,विश्वविद्यालय से ज़्यादा है।
                                   हालांकि आपको कुछ राजनीतिक प्रेरित कृषि विज्ञान छात्रों का वर्ग भी मिल जाएगा जो नए महाविद्यालय खोलने के विरोध में नज़र आता है, पता नहीं क्यों? शायद उन्हें सरकारी नौकरी नहीं चाहिए पर ऐसा कोई नहीं चाह सकता हाँ यह हो सकता है कि छात्रों का यह वर्ग प्रतियोगिता से डरता होगा।
वैसे यह कानून जिस तरह पास हुए हैं वह अलोकतांत्रिक ही था कानून को विपक्ष की गैर-मौजूदगी पर पास किया गया और सहारा लिया गया voice voting का ख़ैर इसके संबंध में बताना विषय के बाहर होगा क्योंकि यह लोकतंत्र से जुड़ा विषय है और शायद आप भी ऊब जाए और फ़ोन को तेज़ी से स्क्रॉल कर अंतिम पंक्ति पढ़ने लगे। प्रधानमंत्री ने आंदोलित किसानों को "भटका" हुआ बताया वैसे प्रधानमंत्री ने One rank One pension के समय आंदोलित सैनिकों, नोटबन्दी के समय विपक्ष को और CAA-NRC आंदोलनकारियों को (जिसमें सिर्फ़ मुस्लिम नहीं थे) और GST के समय फ़िर "भटका" हुआ बताया था पता नहीं वे ऐसे जटिल कानून क्यों ला रहे हैं जो आम आदमी को समझ ही नहीं आ रहा। 
वैसे इन कानूनों को मानने के लिए स्वयं भारतीय किसान संघ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मोहिनी मिश्रा भी नहीं हैं (2 दिसंबर 2020) आख़िर भाजपा कानून लाने के पहले इनसे तो चर्चा कर ही सकती थी।


आंदोलन का अधिकार - अनुच्छेद 19(1)(ए)
                               
                           2014 के पहले जब भी कोई आंदोलन करता था तो मीडिया सरकार से सवाल करती थी लेेेकिन अब जब भी कोई आन्दोलन करता है तो हमारी तुच्छ गोदी मीडिया आंदोलनकारियों से ही सवाल लेकर भिड़ जाती है कि आप क्यों आंदोलन कर रहे हैैं बात इतने में ही ख़त्म नहीं हो जाती Zee News ने #FarmersProtestHijacked और #AandolanMeinKhalistan चलाया Times Now ने #KisanKanoonClash चलाया, CNN ने "War Cry" बताया News18 India ने आंदोलन कॉंग्रेस समर्थित और अर्नब गोस्वामी ने भी वैसे एक और "covid-19 का फ़ैलाव" शायद मीडिया बिहार और बंगाल चुनाव के समय covid-19 का अस्तित्व भूल गयी थी. यह TV media, BJP IT Cell इनकी जो पूरी तैयार मशीनरी है न (अब इसमें एक अभिनेत्री भी है) यह किसानों को "अर्बन नक्सल, आतंंकवादी, खलिस्तानी" बताने में व्यस्त हैैै और कुछ लोग सही जनकारी के अभाव की वज़ह से भ्रमित हो चुके हैं और हो भी कैसे नहीं आख़िर सच बताने का काम तो मीडिया का है ना और उसने तो सरकार को पकड़ रखा है इसलिए किसानों ने अखबार पकड़ लिया, जी हाँ आपने सही पढ़ा!! गोदी मीडिया के लिये यह दिन गौरव का होगा आखिर किसानों को मजबूरन अपना अखबार निकलना पड़ा है नाम है "ट्रॉली टाइम्स" यह अखबार हिंदी और पंजाबी दोनों भाषाओं में उपलब्ध है 5 रु प्रति का खर्च आ रहा है पर फिर भी यह मुुफ्त है, क्या करें गोदी मीडीयाके propganda में पड़े बिन शांतिपुुर्वक आंदोलन करने का यही एक मात्र तरीका बचा है पर आप मत समझिए की लोकतंंत्र ख़त्म नहीं हुआ है आप घबराईये मत तबतक जबतक whatsapp में Good Morning Messege को भेजने से आपको सकरात्मकता मिलती है। और आंदोलन को कुचलने की पुलिस की कोशिश तो आपने देख-सुन ही लिया होगा।
                              
   यह कहने पर कोई आपत्ति नहीं है कि सत्ता के घमंड में चूर सरकार किसानों को उसी तरह अनदेखा कर रही है जिस तरह आजकल front camera generation के युवा whatsapp, instagram के messege को करते हैं लेकिन किसानों की बात सुनकर उनकी बात मानकर सरकार अपनी ही उदारता का का उदाहरण पेश करेगी आंदोलन को वापस न लेना किसानों को पीठ दिखाने जैसा है, किसानों के मन में एक गीत स्वतः स्फूर्त हो रहा होगा क्या हुआ तेरा वादा.... क्योंकि वित्तमंत्री ने फरवरी 2020 के बजट में 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने का लक्ष्य दिया था ख़ैर घोषणाओं में ही सही किसानों की कहीं तो जगह बनी यह चुनावी पोस्टर में दिखने से तो बेहतर ही है हालांकि यह भी सही है कि APMC पर यह पहला प्रहार नहीं है 2003 में भी सरकार ने APMC को Model APMC से परिवर्तित करने की कोशिश हो चुकी है। और कोरोना के भीषण काल में अचानक यह कानून को लाने की आवश्यकता क्यों पड़ी और इस कानून के लिए क्या उन्होंने किसी कृषि संगठन से चर्चा की थी वो भी ऐसी स्थिति में जब देश का हर किसान पर 1 लाख से अधिक के कर्ज पर जी रहा है भारत की 52.5% किसान परिवारों पर यह कर्ज़ का बोझ है यह मैं नहीं कह रहा यह अखिल भारतीय ग्रामीण वित्तीय समावेश सर्वेक्षण की रिपोर्ट है जो NABARD द्वारा तैयार की गयी है। Accidental Death & Suicide Report जो कि NCRB द्वारा तैयार की गई है उसके अनुसार 28 कृषि निर्भर व्यक्ति प्रतिदिन आत्महत्या करते हैं 2019 में यह आंकड़ा 10,281 किसानों की मौत को बताए बिना पूरा नहीं होगा। किसानों की आत्महत्या के मामलों में सबसे पहले महाराष्ट्र फ़िर कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना बदकिस्मती से क्रमशः आते हैं। वैसे सिर्फ़ कृषकों की आत्महत्या के बारे में सुनकर आप ख़ुद को भी अधिक सुरक्षित न समझें क्योंकि भूखे लोगों की परवाह करने वाली एक संस्था हंगर वॉच ने एक रिपोर्ट तैयार की 11 राज्यों के 45% लोगों ने लॉकडाउन से लेकर सितंबर-अक्टूबर तक उधार लेकर पेट का पालन किया हर 4 में से 1 दलित या मुस्लिम को खाने के लिए संघर्ष करना पड़ा और सर्वणों में यह 10:1 के अंतर से था। ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत के गिरते पायदानों को तो आपने सुन ही लिया होगा लेक़िन आश्चर्य करने वाली बात यह है कि हम बांग्लादेश, पाकिस्तान और नेपाल से भी पीछे हैं शाम को TV पर पाकिस्तान को नानी याद दिला देने वाले एंकर से पता नहीं यह ख़बर पता नहीं कैसे छूट गयी। 
                  वैसे सब इतना भी नकारात्मक नहीं हमारे भारत में किसानों द्वारा NH-44 मार्ग पर पिछले कई दिनों विरोध हो रहा है यहाँ की दुकानें आवागमन न होने से चलना मुश्किल हो गयी हैं यही आंदोलित किसान ही आवश्यकता पड़ने पर दुकान जाकर ग्राहक का फ़र्ज भी निभा रहे हैं, कोई पेट्रोल पंप डीजल फ्री में दे रहे हैं तो कोई पेट्रोल पंप अपने वाशरूम महिलाओं के लिए 24 घंटे खोल रहे हैं, ढाबाओं के पार्किंग एरिया में बड़े-बड़े पंडाल लगे हुए हैं किसानों के लिए साथ ही कुछ मूल निवासियों ने अपने घर के एक-दो कमरे वरिष्ठजनों एवं महिलाओं-बच्चों के आराम के लिए खोल रहे हैं। आप भी याद रखें जब भी कोई आंदोलन आपके सामने हो तब उसके कुचलने वाले तत्वों के साथ न मिलकर बल्कि उसके लिए सकारात्मक भूमिका निभायें।

धन्यवाद।

Comments

  1. बहुत सुंदर उत्कर्ष राणा आपसे एसी ही उम्मीद थी हमे

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  2. Bhot shi baat khi hai aapne jitni jaldi sabko samajh aa jaye hmare future ke liye accha hai

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  3. Very informative & detailed description

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